इस्लामिक गठबंधन पर भारत का मास्टरस्ट्रोक? ईरान संकट के बीच बदल सकता है मुस्लिम देशों का समीकरण

नई दिल्ली

ईरान जंग ने मौजूदा वर्ल्‍ड ऑर्डर को उलट-पुलट कर रख दिया है. होर्मुज स्‍ट्रेट से तेल और LPG लदे जहाजों की आवाजाही बुरी तरह से प्रभावित हुई है. मौजूदा संकट को देखते हुए अब तमाम देश एनर्जी सप्‍लाई के लिए अल्‍टरनेटिव रूट डेवलप करने की कोशिश में जुटे हैं. इसके साथ ही पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच देशों के आपसी रिश्‍ते भी बदलने लगे हैं. पुराने समीकरण ध्‍वस्‍त हो रहे हैं तो नए गुट बन रहे हैं. पाकिस्‍तान ने सऊदी अरब और तुर्की के साथ मिलकर इस्‍लामिक NATO की नींव रखने का काम किया है. इन तीनों देशों का लक्ष्‍य संकट के समय एक-दूसरे का साथ देना है. हालांकि, अभी तक यह बस जुबानी जमाखर्च ही साबित हुई है. दूसरी तरफ, इस त्रिकोणीय गठजोड़ के अपने सामरिक महत्‍व भी हैं. अब भारत ने कथित इस्‍लामिक NATO का जवाब अपने अंदाज में तैयार कर लिया है. दिलचस्‍प बात यह है कि इसमें इजरायल की भी एंट्री मानी जा रही है. बता दें कि कुछ दिनों पहले ही इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्‍याहू की UAE यात्रा की बात सामने आई थी. हालांकि, इसे खारिज कर दिया गया है. इटली के सामरिक मामलों के एक्‍सपर्ट मानते हैं कि भारत, UAE और इजरायल का गठजोड़ पश्चिम एशिया में शांति के लिए X फैक्‍टर साबित हो सकता है। 

इटली के जियोपॉलिटकल एक्‍सपर्ट सर्गियो रेस्टेली ने ‘टाइम्‍स ऑफ इजरायल’ में लिखे लेख में भारत, UAE और इजरायल के त्रिकोणीय गठजोड़ की बात कही है. पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत की कूटनीतिक रणनीति को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई चर्चा शुरू हो गई है. भू-राजनीतिक विशेषज्ञ सर्गियो रेस्टेली ने The Times of Israel में प्रकाशित अपने लेख में कहा है कि भारत को संयुक्त अरब अमीरात, इजरायल और ईरान के साथ संतुलित रिश्ते बनाए रखने की कला विकसित करनी होगी. उन्होंने सुझाव दिया कि भारत को खाड़ी देशों को भरोसा दिलाते हुए ईरान के साथ संवाद के दरवाजे खुले रखने चाहिए और साथ ही इजरायल के साथ सहयोग को भी मजबूत करना चाहिए. रेस्टेली के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया UAE यात्रा ऐसे समय हुई जब पश्चिम एशिया में संघर्षों ने वैश्विक शक्तियों की विदेश नीति की परीक्षा लेनी शुरू कर दी है. उन्होंने कहा कि भारत और यूएई के संबंध अब केवल ऊर्जा सहयोग तक सीमित नहीं हैं, बल्कि निवेश, बुनियादी ढांचा, रक्षा, खाद्य सुरक्षा, तकनीक और समुद्री संपर्क जैसे क्षेत्रों तक फैल चुके हैं। 

भारत के लिए यूएई और इजरायल का महत्‍व
इतालवी एक्‍सपर्ट ने यूएई को ऐसा साझेदार बताया जो क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को व्यवहारिक परियोजनाओं में बदलने की क्षमता रखता है. उनके मुताबिक, अबू धाबी भारत की पश्चिम एशिया नीति का अहम स्तंभ बनता जा रहा है. रेस्टेली लिखते हैं कि भारत के लिए खाड़ी क्षेत्र की स्थिरता घरेलू आर्थिक मुद्दा भी है, क्योंकि कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी भी व्यवधान का असर महंगाई, औद्योगिक उत्पादन और घरेलू बजट पर पड़ सकता है. उन्होंने कहा कि भारत के इजरायल के साथ रक्षा, कृषि, साइबर सुरक्षा, जल प्रबंधन और तकनीक के क्षेत्र में मजबूत संबंध हैं. वहीं, यूएई पूंजी, भौगोलिक पहुंच और क्षेत्रीय स्वीकार्यता प्रदान करता है. रेस्टेली के अनुसार, यूएई और इजरायल मिलकर पश्चिम एशिया में एक नए व्यावहारिक ढांचे का निर्माण कर रहे हैं, जो नारों की बजाय बुनियादी ढांचे, इनोवेशन और स्थिरता पर आधारित है। 

ईरान भारत के लिए बेहद महत्‍वपूर्ण
सर्गियो रेस्टेली ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत अपनी पश्चिम एशिया नीति को किसी एक धुरी तक सीमित नहीं कर सकता. उनके मुताबिक, ईरान भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है, खासकर अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच के लिहाज से. उन्होंने चाबहार पोर्ट (Chabahar Port) को भारत-ईरान साझेदारी का सबसे ठोस उदाहरण बताया. रेस्टेली ने कहा कि ईरानी विदेश मंत्री अब्‍बास अरागची (Abbas Araghchi) की दिल्ली यात्रा ने यह संकेत दिया कि भारत तेहरान के साथ गंभीर संवाद बनाए रखना चाहता है. उनके अनुसार, संकटग्रस्त क्षेत्र में सभी पक्षों से संवाद बनाए रखने की क्षमता ही जिम्मेदार कूटनीति की पहचान है. लेख में कहा गया कि यूएई भारत की उभरती पश्चिम एशिया रणनीति का मुख्य आधार है, इजरायल तकनीक और रक्षा क्षेत्र में महत्वपूर्ण सहयोगी है, जबकि ईरान संपर्क और क्षेत्रीय संकट प्रबंधन के लिए आवश्यक साझेदार बना रहेगा. रेस्टेली ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी की अबू धाबी यात्रा ने यह स्पष्ट किया कि भारत अब केवल तेल आयातक देश के रूप में नहीं, बल्कि अपने हितों और रणनीतिक विकल्पों के साथ एक प्रभावशाली शक्ति के रूप में पश्चिम एशिया में अपनी भूमिका तय कर रहा है। 

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