रेलवे का ‘गेम ओवर’! बिजली बकाया केस में सुप्रीम कोर्ट सख्त, चुकाना होगा भारी सरचार्ज

नई दिल्ली
 सुप्रीम कोर्ट ने देश के सबसे बड़े बिजली उपभोक्ताओं में से एक भारतीय रेलवे को बड़ा वित्तीय झटका दिया है. अदालत ने साफ किया है कि रेलवे बिजली कानून के तहत कोई विशेष दर्जा पाने का हकदार नहीं है. उसे अन्य औद्योगिक इकाइयों की तरह ही अपनी बिजली खपत पर सभी तरह के सरचार्ज देने होंगे. जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने रेलवे की आठ अपीलों को पूरी तरह खारिज कर दिया है. कोर्ट ने विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण के पुराने फैसले को सही ठहराया है. इस फैसले से राज्यों की बिजली वितरण कंपनियों को बड़ी राहत मिली है, लेकिन रेलवे के बजट पर इसका बहुत बुरा असर पड़ने की आशंका है। 

रेलवे पर क्यों फूटा 15,000 करोड़ रुपये का वित्तीय बम?
भारतीय रेलवे हर साल करीब 33 अरब यूनिट से ज्यादा बिजली का इस्तेमाल करती है. इस बड़े फैसले के बाद रेलवे को बैकडेटेड एरियर यानी पुराना बकाया भी चुकाना होगा. राज्यों के हिसाब से यह क्रॉस-सब्सिडी सरचार्ज 50 पैसे से लेकर 2.5 रुपये प्रति यूनिट तक है। 

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों की डिस्कॉम कंपनियों को निर्देश दिया है कि वे रेलवे के ओपन एक्सेस इस्तेमाल की अवधि और क्षेत्र के हिसाब से बकाया राशि का आकलन करें. रेलवे के आंतरिक अनुमानों के अनुसार यह कुल बकाया राशि कम से कम 15,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है. यह रकम रेलवे के चालू वित्त वर्ष के बजट को पूरी तरह बिगाड़ सकती है। 

10 साल पुराने कानूनी दांवपेंच में कहां मात खा गई रेलवे?

    रेलवे साल 2015 से अदालत में यह दलील दे रही थी कि वह एक ‘डीम्ड डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी’ है. इस रणनीति के पीछे रेल मंत्रालय और ऊर्जा मंत्रालय का साल 2014 का एक पत्र था। 

    रेलवे का दावा था कि रेलवे एक्ट 1989 की धारा 11 के तहत उसे खुद का बिजली नेटवर्क और डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम बनाने का अधिकार प्राप्त है. इसलिए वह ग्रिड से सीधे बिजली लेते समय किसी भी तरह का सरचार्ज देने के लिए उत्तरदायी नहीं है। 

    सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा कि कानूनन डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी होने के लिए दूसरों को बिजली बेचना जरूरी है, जबकि रेलवे पूरी बिजली खुद ही कंज्यूम करती है। 

रेलवे डिस्ट्रीब्यूटर है या सिर्फ एक कंज्यूमर?
सुप्रीम कोर्ट ने तकनीकी पहलुओं को स्पष्ट करते हुए कहा कि रेलवे का पूरा ओवरहेड इक्विपमेंट और ट्रैक्शन सबस्टेशन उसका आंतरिक सिस्टम है. यह कोई पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम नहीं है. बिजली कानून के तहत लाइसेंसी कहलाने के लिए दो शर्तें पूरी होनी चाहिए। 

    पहली शर्त यह कि आपके पास डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम हो.
    दूसरी यह कि आप किसी तीसरे पक्ष को बिजली की सप्लाई करते हों.

रेलवे जो भी बिजली खरीदती है, उसका इस्तेमाल केवल इंजनों, सिग्नलों और स्टेशनों को चलाने में होता है. वह इसे किसी बाहरी उपभोक्ता को नहीं बेचती है. इसी आधार पर कोर्ट ने रेलवे को बिजली कानून की धारा 2(15) के तहत सिर्फ एक कंज्यूमर माना है। 

क्या अब फेल हो जाएगी रेलवे की महा-बचत योजना?
रेलवे बोर्ड के पूर्व सदस्य मोहम्मद जमशेद के अनुसार, इस अदालती आदेश में रेलवे की पूरी वित्तीय बचत को खत्म करने की क्षमता है. रेलवे ने साल 2015 के आसपास एक बड़ी नीतिगत पहल शुरू की थी. इसके तहत ओपन एक्सेस से सस्ती बिजली खरीदकर एक दशक में 41,000 करोड़ रुपये से ज्यादा बचाने का लक्ष्य था. यह नया फैसला उस पूरी योजना पर पानी फेर सकता है। 

रेलवे ने अपने ब्रॉड-गेज नेटवर्क का लगभग 100% इलेक्ट्रिफिकेशन पूरा कर लिया है. इस मिशन पर करीब 46,000 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं. डीजल पर निर्भरता कम करने और पर्यावरण को बचाने की यह मुहिम अब ओपन एक्सेस मार्केट के महंगे सरचार्ज के जाल में फंस गई है। 

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