गीता पाठ के लिए सही दिशा का चयन क्यों ज़रूरी? जानें इसका दोगुना लाभ

गीता-पाठ सदैव धर्म, ज्ञान और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करने वाला शुभ कर्म माना गया है। श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया यह दिव्य उपदेश आज भी जीवन की हर उलझन का समाधान देता है। वास्तु-शास्त्र के अनुसार यदि गीता का पाठ सही दिशा, सही आसन और सही वातावरण में किया जाए, तो इसका फल कई गुना बढ़ जाता है। मन, घर और ऊर्जा तीनों पवित्र और सकारात्मक हो जाते हैं।

गीता-पाठ के लिए सर्वोत्तम दिशा पूर्व दिशा है। वास्तु शास्त्र में पूर्व दिशा को “ज्ञान, प्रकाश और दिव्यता” की दिशा कहा गया है।
सूर्य उदय की दिशा होने के कारण पूर्व दिशा से घर में देवत्व और शुद्ध ऊर्जा का प्रवेश होता है।

गीता-पाठ का सर्वोत्तम स्थान: पूर्व दिशा की ओर मुख करके पूर्व दिशा में बैठकर गीता पाठ करने से बुद्धि तेज होती है, मन एकाग्र होता है और जीवन में ज्ञान का प्रकाश आता है। यह वही दिशा है जिसमें देवताओं का निवास माना गया है।

दूसरा उत्तम विकल्प उत्तर दिशा: यदि पूर्व दिशा उपलब्ध न हो तो वास्तु के अनुसार उत्तर दिशा भी गीता-पाठ के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है। उत्तर दिशा कुबेर और आध्यात्मिक प्रगति की दिशा है। इस दिशा में पाठ करने से सकारात्मक ऊर्जा, करियर उन्नति और मानसिक शांति प्राप्त होती है।

कौन सी दिशा से बचना चाहिए?
दक्षिण दिशा: यह दिशा पितृ दिशा मानी जाती है। यहां बैठकर गीता-पाठ करने से मन भारी रहता है और एकाग्रता कम होती है।

पश्चिम दिशा: यह दिशा स्थिरता की है पर आध्यात्मिक ग्रंथ पाठ के लिए श्रेष्ठ नहीं है। यहां पाठ करने से ऊर्जा प्रवाह धीमा हो सकता है।

गीता-पाठ का वास्तु-अनुसार आसन और स्थान
आसन: कुशासन, ऊन का आसन या लाल/पीला आसन श्रेष्ठ माना गया है। जमीन पर सीधे न बैठें ऊर्जा अवशोषित हो जाती है।

स्थान: घर का ईशान कोण (उत्तर-पूर्व): पूजा, ध्यान और गीता-पाठ के लिए सर्वश्रेष्ठ है। वहां ऊर्जा अत्यंत शुद्ध और दिव्य होती है।

गीता-पाठ का लाभ वास्तु के अनुसार क्यों बढ़ता है ?
सही दिशा में बैठने से मन शांत, ध्यान स्थिर और विचार दिव्य होते हैं।
घर में सरस्वती, विष्णु और सकारात्मक ब्रह्म ऊर्जा का प्रवेश होता है।
नकारात्मकता दूर होती है, वास्तु-दोष कम होता है, जीवन में सुख-समृद्धि और तनाव-मुक्ति आती है।

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