ट्रंप की 15 शर्तें: ईरान से जंग खत्म करने के लिए एक महीने का सीजफायर, नो न्यूक्लियर और होर्मुज

वाशिंगटन

इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला करने के करीब 25 दिन बाद अमेरिका अब सीजफायर की उम्मीद कर रहा है। बीते दिनों ईरान युद्ध में जीत का दावा करने वाले ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि ईरान के साथ उनकी बातचीत जारी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रंप सरकार ने समझौते के लिए ईरान को एक 15-सूत्रीय युद्धविराम योजना की पेशकश की है, जिसमें युद्ध में एक महीने का सीजफायर का जिक्र है। इस घटनाक्रम से अवगत एक अधिकारी ने यह जानकारी दी है।

अधिकारी ने अपनी पहचान गोपनीय रखे जाने की शर्त पर बताया कि युद्धविराम योजना पाकिस्तान के मध्यस्थों के जरिए ईरान को सौंपी गई। बता दें कि इससे पहले पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में मध्यस्थता की पेशकश की थी। इसके बाद ट्रंप ने भी इसे हरी झंडी दे दी है और कहा है कि ईरानी नेतृत्व के ‘अच्छे लोगों’ के साथ उनकी बातचीत जारी है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने मंगलवार को अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि 15-सूत्रीय योजना ईरानी अधिकारियों को सौंप दी गई है।

ट्रंप की योजना में क्या?
हालांकि पूरा दस्तावेज अभी आधिकारिक तौर पर जारी नहीं किया गया है, लेकिन कई रिपोर्ट्स में यह बात सामने आई है कि इस 15-सूत्रीय योजना का ढांचा तीन बड़ी मांगों पर आधारित है। इसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करने की मांग की गई है। ट्रंप कई मौकों पर यह कह चुके हैं कि ईरान को अपनी परमाणु क्षमताओं को खत्म करना होगा। इसमें यूरेनियम संवर्धन को पूरी तरह रोकना, नतान्ज, फ़ोर्डो और इस्फहान जैसी अहम सुविधाओं को बंद करना और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण की अनुमति देना शामिल है।

प्रॉक्सी मॉडल को छोड़ने की बात भी
इसके अलावा अमेरिका चाहता है कि ईरान अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों की मारक क्षमता और संख्या को सीमित करे। यह मांग ईरान की प्रतिरोधक क्षमता को निशाना बनाती है, ना कि सिर्फ उसकी परमाणु महत्वाकांक्षाओं को। एक और बड़ी मांग यह है कि ईरान हिजबुल्लाह और हूती जैसे क्षेत्रीय गुटों को पैसे देना और हथियार मुहैया कराना बंद करे और पूरे मिडिल ईस्ट में अपने प्रॉक्सी मॉडल को छोड़ दे। इसके अलावा प्लान में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खुला रखने, और सीजफायर की समय-सीमा तय करने की बात भी है। वहीं इन सब के बदले अमेरिका ईरान को प्रतिबंधों में पूरी तरह राहत दे सकता है।

USA के कदम से इजरायल हैरान
उधर, अमेरिका के इस अचानक सीजफायर प्रस्ताव ने इजरायली अधिकारियों को हैरान कर दिया है जो युद्ध जारी रखने के पक्ष में थे. दूसरी ओर, कूटनीतिक कोशिशों के बावजूद पेंटागन क्षेत्र में 3,000 अतिरिक्त सैनिक तैनात कर रहा है. वर्तमान में मिडिल ईस्ट में लगभग 50,000 अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं. ईरान ने पहले ही चेतावनी दी है कि यदि सैन्य गतिविधियां बढ़ीं, तो वह खाड़ी में समुद्री बारूद (नेवल माइंस) बिछा सकता है। 
नया नहीं है पीस प्लान
विशेषज्ञों का कहना है कि ये 15-सूत्रीय ढांचा पूरी तरह नया नहीं है, बल्कि मई 2025 के उस प्रस्ताव पर आधारित है जो इजरायली हमलों के बाद विफल हो गया था. पहले की योजना में कथित तौर पर व्यापक शर्तें लगाई गई थीं, जिनमें ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों पर सख्त सीमाएं लगाना, यूरेनियम भंडार को बाहर भेजना, संवर्धन सुविधाओं को निष्क्रिय करना और प्रतिबंध राहत निधि के इस्तेमाल को प्रतिबंधित करना शामिल था, जबकि केवल आंशिक प्रतिबंधों में ढील और संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में एक नागरिक परमाणु कार्यक्रम की पेशकश की गई थी। 

इस बात को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है कि क्या ये प्रस्ताव औपचारिक रूप से ईरान को प्रस्तुत किया गया है. कुछ राजनयिकों को शक है कि कोई ठोस नया प्रस्ताव मौजूद भी है या नहीं और यदि है भी, तो संभवत इसे अभी तक तेहरान के साथ साझा नहीं किया गया है। 

वहीं, ट्रंप ने दावा किया कि पिछले दो दिनों में हुई बहुत अच्छी और सार्थक बातचीत से ईरान के साथ प्रगति हुई है. हालांकि, तेहरान ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि बातचीत को फिर से शुरू करने के बारे में सीमित अप्रत्यक्ष संपर्कों के अलावा कोई गुप्त वार्ता नहीं हुई है। 

विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप इस युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता (ऑफ-रैंप) तलाश रहे हैं. हालांकि, दोनों देशों के बीच गहरे अविश्वास और ईरान के अंदर वार्ता के अधिकार को लेकर अनिश्चितता इस शांति प्रक्रिया में बड़ी बाधा है। 

मानेगा ईरान?
ईरान ने अब तक अमेरिका के साथ बातचीत की संभावना को खारिज ही किया है। ऐसे में इसकी बेहद कम संभावना है कि ईरान ट्रंप की इन मांगों को समर्थन देगा। इसकी वजह यह है कि यह प्रस्ताव किसी नई शांति पहल से ज्यादा, पहले नाकाम हो चुकी परमाणु वार्ताओं का ही एक नया रूप लगता है। ईरान का तर्क है कि पिछली बार बातचीत के बीच ही अमेरिका ने हमला कर दिया, जिससे नई गारंटियों पर विश्वास करना मुश्किल हो जाता है।

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