रायपुर में पुलिस कमिश्नर प्रणाली का अंदेशा, 5 आईजी आईपीएस अधिकारियों के नाम पर हो रही चर्चा

 रायपुर
 रायपुर में पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू होने की सुगबुगाहट तेज हो गई है। अगले साल एक जनवरी को लेकर सरकार के भीतर मंत्रणा चल रही है। एक जनवरी को अगर ना भी हुआ तो उस दिन कम-से-कम नोटिफिकेशन जारी हो जाएगा। वैसे सरकार के लोगों की कोशिश है कि एक जनवरी से पुलिस के इस बड़े रिफार्म का आगाज हो जाए।

हालांकि, एक जनवरी में टाईम काफी कम बच गया है। मुश्किल से हफ्ता भर समय है। किस प्रकार का पुलिस कमिश्नर सिस्टम होगा, इस पर भी अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। हालांकि, चाहेगी तो हफ्ता भर काफी है। अब ज्यादा लेट होने की गुंजाइश इसलिए नहीं है कि मुख्यमंत्री के ऐलान किए सवा साल से अधिका हो गया है। सीएम विष्णुदेव साय ने 15 अगस्त 2024 के भाषण में पुलिस कमिश्नर सिस्टम शुरू करने की घोषणा की थी। उनके ऐलान के बाद काफी वक्त निकल चुका है। इसलिए, अब ज्यादा विलंब करने का प्रश्न नहीं उठता।

छत्तीसगढ़ के रजत जयंती समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों पुलिस कमिश्नर सिस्टम प्रारंभ करने चर्चाएं थीं मगर ऐन वक्त पर उसे टाल दिया गया। बाद में पता चला कि विधानसभा के शीतकालीन सत्र में विधयेक पारित कर एक्ट बनाया जाएगा। याने ओड़िसा की तरह काफी सशक्त पुलिस कमिश्नर प्रणाली बनाया जाएगा। किंतु उसके बाद विधानसभा का एक दिन का स्पेशल सत्र भी निकल गया और फिर शीतकालीन सत्र भी।

रायपुर के फर्स्ट पुलिस कमिश्नर के लिए आईजी लेवल के पांच आईपीएस अधिकारियों के नाम चर्चाओं में हैं, उनमें पुलिस मुख्यालय में पोस्टेड अजय यादव, ब्रदीनारायण मीणा, बिलासपुर आईजी संजीव शुक्ला, दुर्ग आईजी रामगोपाल गर्ग और सरगुजा आईजी दीपक झा का नाम प्रमुख है। हालांकि, महिला आईजी के तौर पर एक नाम नेहा चंपावत का भी है। उन्होंने एलएलबी करने के बाद यूपीएससी क्रैक किया। सरकार को अगर फर्स्ट पुलिस कमिश्नर के लिए महिला आईपीएस जंचेगी तो उन्हें मौका मिल सकता है। नेहा तेज-तर्रार आईपीएस अधिकारी हैं। एसपी के तौर पर उन्होंने सिर्फ एक जिला महासमुंद किया है। तेज महिलाएं पुलिस में सफल भी होती हैं, क्योंकि उनसे अकरण कोई हुज्जत नहीं करता। यद्यपि, रायपुर रेंज आईजी अमरेश मिश्रा भी बेहतर चयन हो सकते हैं, मगर एसीबी और ईओडब्लू की जिम्मेदारियों के चलते सरकार शायद ही उनके नाम पर विचार करें। कोरबा में कुख्यात अपराधी का एककांउटर करने वाले सुंदरराज इस समय बस्तर आईजी हैं। नक्सलियों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई के चलते उन्हें सरकार अभी टच नहीं करेगी।

पांच नामों की चर्चा सबसे अधिक

रायपुर पुलिस कमिश्नर के लिए वैसे पांच आईपीएस अधिकारियों की चर्चा सबसे अधिक है। अब सरकार नेहा चंपावत जैसा कोई नया प्रयोग कर चौंका दें तो बात अलग है। मगर इन नामों पर जोर ज्यादा है। चलिये बताते हैं इन पांचों आईपीएस अधिकारियों के बारे में कौन, किस-किस जिले में एसपी, आईजी रहे….

1. अजय यादव

2004 बैच के आईपीएस अजय यादव सात जिलों के एसपी रहे। नारायणपुर से उनकी कप्तानी शुरू हुई थी, इसके बाद कांकेर, बिलासपुर जांजगीर, दुर्ग, रायपुर में एसएसपी रहे। प्रोफाइल के हिसाब से देखें तो अजय यादव काफी मजबूत स्थिति में हैं। वे रायपुर, बिलासपुर और सरगुजा को मिलाकर तीन पुलिस रेंज के आईजी रह चुके हैं। इसके अलावा पुलिस महकमे में नेक्स्ट टू डीजीपी इंटेलिजेंस चीफ की भी पोस्टिंग वे कर चुके हैं।

2. बद्रीनारायण मीणा

2004 बैच के आईपीएस बद्री नारायण मीणा छत्तीसगढ़ में नौ जिले के एसपी रह चुके हैं। बलरामपुर से उनकी कप्तानी का सफर प्रारंभ हुआ। इसके बाद कवर्धा, राजनांदगांव, जगदलपुर, कोरबा, बिलासपुर, रायपुर, रायगढ़ और दुर्ग। बद्री चार पुलिस रेंज के आईजी रह चुके हैं। वे पहले आईपीएस अधिकारी होंगे, जो दुर्ग के साथ रायपुर के भी आईजी रहे। इसके बाद फिर बिलासपुर के आईजी बनाए गए। बिलासपुर के बाद उन्हें फिर दुर्ग आईजी का दायित्व सौंपा गया। याने तीन पुलिस रेंज में वे चार बार आईजी रहे। वे डेपुटेशन पर तीन साल तक आईबी में भी रहे।

3. संजीव शुक्ला

संजीव शुक्ला इस समय बिलासपुर पुलिस रेंज के आईजी हैं। वे पांच जिलों के पुलिस अधीक्षक रहे हैं। इनमें जशपुर, रायगढ़, राजनांदगांव, दुर्ग और रायपुर शामिल है। वे नक्सल प्रभावित इलाका कांकेर के डीआईजी भी रह चुके हैं।

4. रामगोपाल गर्ग

2007 बैच के आईपीएस रामगोपाल गर्ग सात साल सीबीआई में डेपुटेशन पर रहने के कारण ज्यादा जिलों के एसपी नहीं रह सके। दिल्ली जाने के बाद वे गरियाबंद के एसपी रहे। और जब लौटकर आए तो डीआईजी बन चुके थे। उन्हें अंबिकापुर पुलिस रेंज का प्रभारी आईजी बनाकर भेजा गया। वहां से फिर रायगढ़ का डीआईजी। फिर विधानसभा चुनाव के समय दुर्ग के एसएसपी बने। चुनाव के बाद दुर्ग के प्रभारी आईजी बने और फिर पिछले साल प्रमोशन होने पर वहीं आईजी बन गए। रामगोपाल का कैरियर बड़ा उतार-चढ़ाव वाला रहा। याने सरगुजा जैसे रेंज का आईजी रहने के बाद रायगढ़ का डीआईजी। इसके बाद दुर्ग का एसपी, फिर दुर्ग का प्रभारी आईजी, आईजी।

5. दीपक झा

2008 बैच के आईपीएस दीपक झा सात जिलों के एसपी रह चुके हैं। कोंडागांव से उनके कप्तानी का सफर प्रारंभ हुआ था, उसके बाद बालोद, महासमुंद, रायगढ़, जगदलपुर, बिलासपुर और फिर बलौदा बाजार। इसके बाद उन्हें नवगठित राजनांदगांव पुलिस रेंज का प्रभारी आईजी बनाया गया। पिछले साल उन्हें आईजी प्रमोट होने पर अंबिकापुर पुलिस रेंज के आईजी की जिम्मेदारी दी गई।

नाम का पुलिस कमिश्नर

पता चला है, एक जनवरी से रायपुर में पुलिस कमिश्नर सिस्टम प्रारंभ हो जाएगा। मगर इसके साथ यह भी जानकारी मिली है कि सोशल मीडिया और मीडिया में जो बातें चल रही हैं, उससे उलट सिर्फ नाम के लिए पुलिस कमिश्नर होगा। उसे प्रतिबंधात्मक धारा याने 151 के अलावा और कोई अधिकार देने के पक्ष में सिस्टम नहीं है।

ओड़िसा सबसे बेस्ट

देश में चूकि ओड़िसा में पुलिस कमिश्नर सिस्टम ताजा लागू हुआ है, इसलिए उसका सिस्टम भी काफी तगड़ा है। ओड़िसा ने एक्ट बनाकर उसे क्रियान्वित किया है। लेकिन, छत्तीसगढ़ में एक वर्ग मध्यप्रदेश से ज्यादा अधिकार पुलिस कमिश्नर को देना नहीं चाहता। जाहिर है, एमपी में आईएएस लॉबी के तगड़े विरोध के चलते दंतविहीन पुलिस कमिश्नर सिस्टम बनाया गया, जिसका प्रदेश को कोई लाभ नहीं मिल रहा। वहां के मुख्यमंत्री मोहन यादव अब ओड़िसा की तत्कालीन नवीन पटनायक सरकार द्वारा बनाए गए सिस्टम को फॉलो करने पर मंत्रणा कर रहे हैं।

अंग्रेजी शासन काल से पुलिस कमिश्नर

पुलिस कमिश्नर सिस्टम अंग्रेजों के समय से चला आ रहा है। आजादी के पहले कोलकाता, चेन्नई और मुंबई जैसे देश के तीन महानगरों में लॉ एंड आर्डर को कंट्रोल करने के लिए अंग्रेजों ने वहां पुलिस कमिश्नर सिस्टम प्रभावशील कर रखा था। आजादी के बाद देश को यह वीरासत में मिली। चूकि बड़े महानगरों में अपराध बड़े स्तर पर होते हैं, इसलिए पुलिस को पावर देना जरूरी समझा गया। लिहाजा, अंग्रेजों की व्यवस्था आजाद भारत में भी बड़े शहरों में लागू रही। बल्कि पुलिस अधिनियम 1861 के तहत लागू पुलिस कमिश्नर सिस्टम को और राज्यों में भी प्रभावशील किया गया।

कमिश्नर को दंडाधिकारी पावर

वर्तमान सिस्टम में राज्य पुलिस के पास कोई अधिकार नहीं होते। उसे छोटी-छोटी कार्रवाइयों के लिए कलेक्टर, एसडीएम और तहसीलदार, नायब तहसीलदारों का मुंह ताकना पड़ता है। दरअसल, भारतीय पुलिस अधिनियम 1861 के धारा 4 में जिले के कलेक्टरों को जिला दंडाधिकारी का अधिकार दिया गया है। इसके जरिये पुलिस उसके नियंत्रण में होती है। बिना डीएम के आदेश के पुलिस कुछ नहीं कर सकती। सिवाए एफआईआर करने के। इसके अलावा पुलिस अधिनियम 1861 में कलेक्टरों को सीआरपीसी के तहत कई अधिकार दिए गए हैं। पुलिस को अगर लाठी चार्ज करना होगा तो बिना मजिस्ट्रेट के आदेश के वह नहीं कर सकती। कोई जुलूस, धरना की इजाजत भी कलेक्टर देते हैं। प्रतिबंधात्मक धाराओं में जमानत देने का अधिकार भी जिला मजिस्ट्रेट में समाहित होता है। कलेक्टर के नीचे एडीएम, एसडीएम या तहसीलदार इन धाराओं में जमानत देते हैं।

तत्काल फैसला लेने का अधिकार

महानगरों या बड़े शहरों में अपराध भी उच्च स्तर का होता है। उसके लिए पुलिस के पास न बड़ी टीम चाहिए बल्कि अपराधियों से निबटने के लिए अधिकार की भी जरूरत पड़ती है। धरना, प्रदर्शन के दौरान कई बार भीड़े उत्तेजित या हिंसक हो जाती है। पुलिस के पास कोई अधिकार होते नहीं, इसलिए उसे कलेक्टर से कार्रवाई से पहले इजाजत मांगनी पड़ती है। पुलिस कमिश्नर लागू हो जाने के बाद एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के अधिकार पुलिस कमिश्नर को मिल जाएंगे। इससे फायदा यह होगा कि पुलिस विषम परिस्थितियों में तत्काल फैसला ले सकती है। हालांकि, इससे पुलिस की जवाबदेही भी बढ़ जाती है।

शास्त्र और बार लायसेंस

पुलिस कमिश्नर सिस्टम में पुलिस को धरना, प्रदर्शन की अनुमति देने के साथ ही शस्त्र और बार का लायसेंस देने का अधिकार भी मिल जाता है। अभी ये अधिकार कलेक्टर के पास होते हैं। कलेक्टर ही एसपी की रिपोर्ट पर शस्त्र लायसेंस की अनुशंसा करता है। बार का लायसेंस भी कलेक्टर जारी करता है।

मगर छत्तीसगढ़ में नहीं

पुलिस कमिश्नर सिस्टम में उक्त सभी अधिकारी पुलिस को होते हैं मगर छत्तीसगढ़ में जो सिस्टम लागू होने जा रहा, वो सिर्फ रस्मी होगा। याने पुलिस कमिश्नर बनकर भी उसे एसपी से खास ज्यादा कोई अधिकार नहीं होगा। वो न तो बार का लायसेंस देखेगा और न ही शास्त्र लायसेंस। उसके पास जिला बदर के अधिकार भी नहीं होंगे।

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