नया एजुकेशन सेशन शुरू होते ही स्कूलों में पढ़ाई का माहौल, शिक्षकों की तैयारी और छात्रों का स्वागत देखने को मिलता है. लेकिन वर्तमान हालात बताते हैं कि शिक्षा क्षेत्र में नौकरी का पैटर्न तेजी से बदल रहा है. एआई की आमद के साथ ही टीचर्स के जॉब और रोल बदलने वाले हैं. हो सकता है कल को क्लासरूम में एआई एक्सपर्ट या भाषाविद क्लास लेते मिलें. यही नहीं और भी बहुत कुछ बदल रहा है.
एआई की आमद के साथ ही आने वाले समय में भारत में भी स्कूलों में एआई की शिक्षा पर जोर होगा. सीबीएसई बोर्ड ने क्लास-6 से एआई की पढ़ाई को जोड़ने की तैयारी भी कर ली है. यही नहीं स्कूलों ने अब स्किल लर्निंंग की ओर भी रुख करने का मन बना लिया है. बदलते दौर में जब डिग्रियों से ज्यादा स्किल की जरूरत पर बल दिया जा रहा है, ऐसे में जाहिर है कि स्कूलों में भी अब जॉब टाइटल बदलने वाले हैं. स्कूलों में अब एआई एक्सपर्ट से लेकर स्किल्ड टीचर्स की मांग बढ़ेगी, जिसके लिए पारंपरिक डिग्रियां जैसे बीएड, बीटीसी, टीचर्स एंट्रेस टेस्ट के जरिये शिक्षकों की भर्ती के अलावा स्कूल में जॉब पाने के दूसरे रास्ते भी खुलने वाले हैं.
रिपोर्ट ये भी बताते हैं कि आने वाले सालों में शिक्षा के क्षेत्र में सबसे ज्यादा बढ़ने वाली नौकरियां क्लासरूम टीचिंग से हटकर होंगी यानी सपोर्ट और सहायक भूमिकाओं में होंगी. इनमें सब्स्टिट्यूट टीचर्स, थेरेपिस्ट और टेक्नोलॉजी से जुड़े पोस्ट शामिल होंगे. अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? यह बदलाव छात्रों की संख्या में उतार-चढ़ाव, फंडिंग में कटौती और स्कूल इमरजेंसी फंड खत्म होने के कारण हो रहा है. कई स्कूल अब छंटनी कर रहे हैं. रिपोर्ट यह भी बताती है कि आने वाले समय में स्कूलों को अहम पोस्ट पर योग्य लोगों की कमी का सामना करना पड़ सकता है, जिससे शिक्षा व्यवस्था पर और दबाव बढ़ सकता है.
आने वाले समय में इन क्षेत्रों में होगा विकास
साल 2034 तक शिक्षा क्षेत्र में कई नए नौकरी के अवसर बढ़ने की संभावना है. इनमें सबसे ज्यादा बढ़ोतरी अस्थायी या स्थानापन्न शिक्षकों (सब्स्टिट्यूट टीचर्स) की होगी. रिपोर्ट के अनुसार, इस अवधि में इनकी संख्या में 10,000 से अधिक की बढ़त हो सकती है, जिससे यह पद शिक्षा क्षेत्र में सबसे तेजी से बढ़ने वाली नौकरियों में टॉप पर रहेंगे. इनमें
सब्स्टिट्यूट टीचर्स (अस्थायी शिक्षक)
स्पीच और लैंग्वेज थेरेपिस्ट
ऑक्युपेशनल और फिजिकल थेरेपी सपोर्ट स्टाफ
स्कूल सोशल वर्कर
एजुकेशन टेक्नोलॉजी और IT सपोर्ट रोल्स शामिल हैं.
इन भूमिकाओं की मांग इसलिए बढ़ रही है क्योंकि स्कूल अब सिर्फ पढ़ाई ही नहीं, बल्कि छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य, स्पेशल नीड्स और डिजिटल लर्निंग पर भी ज्यादा ध्यान दे रहे हैं.
कम हो रही है इस क्षेत्र में जॉब
मालिया हाइट, जो यूटा राज्य शिक्षा बोर्ड में शिक्षा लाइसेंसिंग की अधिकारी हैं कहती हैं कि राज्य और केंद्र की फंडिंग की वजह से यूटा में शिक्षक सहायकों और पैराएजुकेटरों की नौकरियां बढ़ रही हैं. ये लोग छात्रों के व्यवहार और शुरुआती पढ़ाई में मदद करते हैं. लेकिन उनका कहना है कि इन पदों पर लोग कम आते हैं क्योंकि सैलरी कम होती है और ज्यादातर काम पार्ट-टाइम होता है. कई जगह इन नौकरियों में सिर्फ 9 डॉलर यानी 839 रुपये प्रति घंटे मिलते हैं, जबकि दूसरे शुरुआती कामों में इससे ज्यादा कमाई हो सकती है. इसी वजह से कई जगह ये पद खाली रह जाते हैं. हाइट यह भी बताती हैं कि शिक्षा क्षेत्र में सभी नौकरियां एक जैसी नहीं बढ़ रहीं.
आने वाले समय में स्पीच थेरेपिस्ट, सोशल वर्कर और ऑक्युपेशनल थेरेपिस्ट जैसे पदों की मांग ज्यादा बढ़ने की उम्मीद है. वह बताती हैं कि यह दूसरा साल है जब छात्रों के नामांकन में कमी देखी जा रही है. इसका असर यह हो रहा है कि स्कूलों को कम शिक्षकों की जरूरत पड़ रही है, बजट में कमी आ रही है और कई स्कूल बंद भी हो रहे हैं. इस स्थिति में शिक्षा क्षेत्र में नौकरी बढ़ने की संभावना बहुत कम है. K-12 तकनीकी पेशेवर संगठन, कंसोर्टियम फॉर स्कूल नेटवर्किंग की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि स्कूलों में आईटी स्टाफ को बनाए रखना भी मुश्किल हो रहा है. कई स्कूलों को तकनीकी कर्मचारियों की कमी का सामना करना पड़ रहा है. सर्वे में शामिल 16% स्कूल ने कहा कि महामारी के दौरान मिली सरकारी सहायता खत्म होने के बाद अब उन्हें आईटी स्टाफ खोने का खतरा है.
बढ़ रही है स्वास्थ्य कर्मियों की मांग
रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षा क्षेत्र में आने वाले समय में स्वास्थ्य और तकनीक से जुड़ी नौकरियां तेजी से बढ़ेंगी. प्रोथेरेपी नाम की स्टाफिंग कंपनी की एक रिपोर्ट बताती है कि 2026 में फिजियोथेरेपिस्ट असिस्टेंट, स्पीच-लैंग्वेज पैथोलॉजिस्ट और फिजियोथेरेपिस्ट जैसे पदों की मांग सबसे ज्यादा होगी और इनमें लगातार अच्छी ग्रोथ देखने को मिलेगी. इन पेशेवरों की जरूरत इसलिए बढ़ रही है क्योंकि स्कूल अब दिव्यांग छात्रों की जल्दी पहचान करके उन्हें समय पर मदद देना चाहते हैं ताकि वे स्कूल की एक्टिविटी में शामिल हो सकें, कई मामलों में तो यह सहायता 3 साल की उम्र से ही शुरू कर दी जाती है.
तो इसलिए बढ़ी है मांग…
डकोटा लॉन्ग, जिन्होंने इस रिपोर्ट को तैयार किया है कहते हैं कि इन पदों की मांग इसलिए भी बढ़ रही है क्योंकि इन क्षेत्रों के लोग सिर्फ स्कूलों में ही नहीं, बल्कि अस्पतालों और क्लीनिकों में भी काम कर सकते हैं, जिससे नौकरी का दायरा बड़ा हो जाता है. वहीं, यूटा राज्य की अधिकारी मालिया हाइट का कहना है कि भले ही इन गैर-शिक्षक नौकरियों में बढ़ोतरी हो रही है, लेकिन असल बढ़ोतरी उतनी बड़ी नहीं है जितना अनुमान लगाया जा रहा है. उनका यह भी कहना है कि कुछ क्षेत्रों में यह वृद्धि भले ही प्रतिशत के हिसाब से ज्यादा दिखे, लेकिन वास्तविक संख्या अभी भी सीमित है.









