इनसाइड स्टोरी: एक तीर से तीन निशाने साध गए नेतन्याहू, गाजा में क्यों तोड़ा सीजफायर

नई दिल्ली
इजरायल ने बुधवार को लगातार दूसरे दिन गाजा पट्टी पर ताबड़तोड़ हवाई हमले किए हैं। ताजा हमलों में 14 फिलिस्तीनियों की मौत हो गई है। इससे पहले इजरायल ने हमास के साथ एकतरफा युद्धविराम तोड़ते हुए मंगलवार को तड़के गाजा पट्टी पर कई हवाई हमले किए थे, जिसमें 400 से ज्यादा लोग मारे गए जबकि 500 से अधिक घायल हुए हैं। जनवरी में संघर्षविराम लागू होने के बाद से इजरायल द्वारा इस क्षेत्र में हमास के ठिकानों पर सबसे बड़ा हमला है।

इजरायली हमलों का यह सिलसिला इस बात का प्रमाण है कि इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू हमास के साथ युद्ध विराम से बाहर निकल गए हैं। जनवरी में उन्होंने युद्ध विराम पर सहमति जताई थी। हालांकि, वह शुरू से ही इस उलझन में थे कि हमास के खिलाफ युद्ध रोका जाय या नहीं लेकिन बंधकों की रिहाई के मुद्दे पर उन्हें अमेरिकी और अपने ही देश के लोगों के दबाव में झुकना पड़ा था। अब जब हमास ने बंधकों का रिहाई रोक दी है, तब नेतन्याहू ने उसी का बहाना बनाकर फिर से गाजा पट्टी पर हमले शुरू कर दिए हैं।

नेतन्याहू पर दोहरा दबाव
हमास द्वारा बंधक बनाए गए इजरायली लोगों का परिवार चाहता है कि नेतन्याहू हमास के साथ समझौता कर सभी बंधकों को मुक्त कराएं, जबकि उनके दक्षिणपंथी गठबंधन सहयोगी हमास को खत्म करने के उद्देश्य से युद्ध जारी रखना चाहते हैं। इस बीच हमास के एक अधिकारी ताहिर अल-नोनो का कहना है कि हमास गाजा पट्टी पर फिर से इजरायली बमबारी के बावजूद बातचीत के दरवाजे बंद नहीं किए हैं, लेकिन इस बात पर भी जोर दिया है कि जब एक हस्ताक्षरित समझौता अस्तित्व में है तब तक नए समझौते की दरकार नहीं है।

ट्रंप का नया दांव
भारी उलझन के बीच नेतन्याहू ने गठबंधन सहयोगी के रास्ते पर चलना उचित समझा और मंगलवार से गाजा पर कहर बरपाना शुरू कर दिया है। बड़ी बात ये है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के प्रशासन ने भी नेतन्याहू के इस फैसले का समर्थन किया है, जिसमें उन्होंने एकतरफा युद्धविराम से अलग होकर गाजा पर हवाई हमले किए हैं। यहां यह बात भी दिलचस्प है कि ये वही ट्रंप हैं जिन्होंने हमास-इजरायल के बीच हुए युद्ध विराम की मध्यस्थता का श्रेय लिया था। संभवत: यह गाजा वासियों को अप्रीकी देशों में बसाने के उनके प्लान में आ रही दिक्कतों के बाद बदला स्टैंड है।

दरअसल, इजरायल और अमेरिका दोनों ही अब हमास को इस बात का दोषी ठहरा रहे हैं कि उसने स्थाई रूप से युद्ध समाप्त करने के लिए बातचीत को आगे बढ़ाने से पहले अन्य बंधकों को रिहा करने से इनकार कर दिया, जबकि युद्ध विराम समझौते में इसका उल्लेख नहीं था। उधर, इजराइल का आरोप है कि हमास इसकी आड़ में नए हमलों की तैयारी कर रहा था। हालांकि, इजरायल ने इसका कोई सबूत नहीं दिया है। दूसरकी तरफ हमास ने इन आरोपों से इनकार किया है।

युद्ध विराम समझौते में क्या कहा गया था?
निवर्तमान बाइडेन प्रशासन और आने वाले ट्रम्प प्रशासन के दबाव में जनवरी में हुए युद्धविराम समझौते में चरणबद्ध तरीके से सीजफायर का आह्वान किया गया था। इसके साथ ही 7 अक्टूबर, 2023 को हुए हमास के हमले में अपहृत सभी बंधकों को मुक्त करना और उसके कारण होने वाले युद्ध को समाप्त करना था। सीजफायर के पहले चरण (19 जनवरी से 1 मार्च तक) में हमास ने लगभग 1,800 फिलिस्तीनी कैदियों के बदले में 25 इजरायली बंधकों और आठ अन्य के शवों को रिहा किया, जिनमें घातक हमलों के लिए आजीवन कारावास की सजा काट रहे वरिष्ठ हमास आतंकवादी भी शामिल थे। हालांकि, सीजफायर की वजह से इजरायली सेना बफर जोन में वापस चली गई और लाखों फिलिस्तीनी अपने घरों में वापस लौट आए और गाजा पट्टी में मानवीय सहायता कार्यक्रम में तेजी आ सकी लेकिन अब वह थम चुका है।

नेतन्याहू ने युद्ध विराम से पीछे क्यों हट गए?
अब सवाल उठता है कि जब सब पटरी पर चल रहा था और सिर्फ बंधकों की रिहाई धीमी पड़ी थी, तब नेतन्याहू ने फिर से एकतरफा युद्ध क्यों छेड़ दिया और मध्य-पूर्व को नया संकट में क्यों डाल दिया। दरअसल, नेतन्याहू अगर अगले चरण में जो मार्च में शुरू होना था, उस पर आगे बढ़कर स्थायी युद्ध विराम पर सहमत होते तो निश्चित रूप से एक राजनीतिक संकट में फंस जाते, जो उनके लगभग 15 साल के शासन को समाप्त कर सकता था। AP की रिपोर्ट में कहा गया है कि नेतन्याहू के दक्षिणपंथी सहयोगी और वित्त मंत्री बेज़ेल स्मोट्रिच ने धमकी दी थी कि अगर नेतन्याहू गाजा पर फिर से हमले शुरू करने के बजाय अगर युद्धविराम के दूसरे चरण की तरफ कदम बढ़ाते हैं तो वह गठबंधन तोड़ देंगे। अगर ऐसा होता तो इजरायल में समय पूर्व चुनाव होने की संभावना बढ़ जाती और नेतन्याहू को इस बात का भय है कि अगर अभी चुनाव हो तो उन्हें हार का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि उनकी सरकार के खिलाफ आमजनों में काफी रोष है।

दक्षिणपंथियों का फिर मिला साथ
हालिया सर्वे में भी ये बात सामने आई है कि तीन चौथाई इजरायली नेतन्याहू से पद छोड़ने की मांग कर रहे हैं। अब लड़ाई को फिर से शुरू करके नेतन्याहू ने एक तरफ स्मोट्रिच का समर्थन सुनिश्चित कर लिया है, दूसरी तरफ किसी भी चुनाव की संभावना को खत्म कर दिया है।

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