गूगल और माइक्रोसॉफ्ट के पासवर्ड-फ्री लॉगिन सिस्टम की शुरुआत, भारत में हो सकते हैं बड़े मुद्दे

नई दिल्ली
   पासवर्ड अब धीरे धीरे बीते दौर की चीज बनते जा रहे हैं. दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां यह मान चुकी हैं कि पासवर्ड न सिर्फ असुरक्षित हैं, बल्कि यूज़र एक्सपीरियंस के लिहाज से भी कमजोर पड़ चुके हैं.

इसी वजह से Passkey और FIDEO बेस्ड पासवर्डलेस लॉगिन सिस्टम को तेजी से अपनाया जा रहा है. गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और कई बड़े प्लेटफॉर्म अब Passkey को सुरक्षित और फिशिंग प्रूफ विकल्प के तौर पर आगे बढ़ा रहे हैं.

FIDEO अलायंस के मुताबिक पिछले दो सालों में पासकी सपोर्ट करने वाले अकाउंट्स की संख्या अरबों तक पहुंच चुकी है. गूगल ने साफ कहा है कि वह पासकी को भविष्य का डिफॉल्ट लॉगिन मानता है, जबकि माइक्रोसॉफ्ट नए यूज़र्स को पासवर्ड के बिना अकाउंट बनाने के लिए प्रेरित कर रहा है. 

टेक इंडस्ट्री में यह एक बड़ा बदलाव है, क्योंकि पहली बार पासवर्ड को हटाने की कोशिश स्केल पर हो रही है. Passkey के जरिए किसी भी अकाउंट को लॉगइन करना काफी आसान और सिक्योर है.

पासकी सिस्टम का दावा है कि यह फिशिंग से लगभग पूरी तरह सुरक्षित है. इसमें पासवर्ड याद रखने या टाइप करने की जरूरत नहीं होती. लॉगिन आपके डिवाइस और बायोमेट्रिक पर आधारित होता है, जैसे फिंगरप्रिंट या फेस आईडी. यही वजह है कि सिक्योरिटी एक्सपर्ट्स इसे अब तक का सबसे सुरक्षित ऑथेंटिकेशन तरीका मानते हैं. आसान शब्दों में समझें तो आपका फोन ही पासवर्ड की तरह काम करता है.

भारत में अगल है स्थिति…

लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब इस टेक्नोलॉजी को इंडिया जैसे देश में लागू करने की बात आती है. यहां टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल सिर्फ पर्सनल फोन तक सीमित नहीं है. भारत में फोन शेयर करना आम है. एक ही डिवाइस घर के कई लोग इस्तेमाल करते हैं. सिम बदलना, फोन अपग्रेड करना या सेकेंड हैंड डिवाइस लेना भी सामान्य बात है.

पासकी सिस्टम डिवाइस से डीपली इंटिग्रेटेड होता है. अगर फोन खो जाए, चोरी हो जाए या खराब हो जाए, तो यूज़र के सामने सबसे बड़ा सवाल खड़ा हो जाता है कि अकाउंट वापस कैसे मिलेगा.

अभी तक पासकी रिकवरी का कोई एक जैसा और आसान तरीका सभी प्लेटफॉर्म पर मौजूद नहीं है. कई मामलों में रिकवरी प्रोसेस इतना मुश्किल होता है कि यूज़र खुद को लॉक आउट महसूस करने लगता है.

यही वजह है कि यूएक्स रिसर्च और इंडस्ट्री रिपोर्ट्स में बार बार यह बात सामने आई है कि पासकी अपनाने में सबसे बड़ी रुकावट टेक्नोलॉजी नहीं, बल्कि अकाउंट रिकवरी है.

जिन देशों में हर यूज़र के पास पर्सनल फोन, क्लाउड बैकअप और मल्टी डिवाइस सिंक मौजूद है, वहां यह सिस्टम आसानी से काम करता है. लेकिन भारत में यह मानकर चलना कि हर यूज़र के पास वही सुविधाएं हैं, एक बड़ी भूल हो सकती है.

डिवाइस शेयरिंग भी बड़ा इश्यू है…

एक और बड़ी चुनौती है डिवाइस शेयरिंग. अगर किसी परिवार में एक फोन पर कई लोगों के अकाउंट लॉगिन हैं, तो पासकी सिस्टम में प्राइवेसी और एक्सेस कंट्रोल को संभालना मुश्किल हो जाता है.

इसी वजह से कई प्लेटफॉर्म मजबूरी में बैकअप के तौर पर पुराने और कम सुरक्षित लॉगिन तरीके भी छोड़ देते हैं, जिससे पासकी का असली सुरक्षा फायदा कमजोर पड़ जाता है.

टेक कंपनियां यह मानती हैं कि पासकी भविष्य हैं, लेकिन इंडिया के लिए यह भविष्य बिना तैयारी के नहीं आ सकता. जब तक अकाउंट रिकवरी, ऑफलाइन बैकअप और डिवाइस लॉस जैसे हालात के लिए साफ और सरल समाधान नहीं दिए जाते, तब तक पासवर्डलेस सिस्टम कई यूज़र्स के लिए सुविधा की जगह परेशानी बन सकता है.

आपको क्या करना चाहिए?

अगर आप अपना फोन किसी के साथ शेयर नहीं करते हैं तो आप अपने फोन को Passkey के तौर पर यूज कर सकते हैं. Gmail अकाउंट से लेकर कई दूसरे अकाउंट में Passkey ऐड करने का ऑप्शन होता है. लेकिन अगर आपको पासवर्ड मैनेज ही करना है तो आप 1Pass जैसे ऐप्स यूज कर सकते हैं. हालांकि ये पेड ऐप है और इसके लिए आपको सब्सक्रिप्शन लेना होता है. 

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