गंगा और जमुनी तहजीब की ख़ास है कहानी, 52 शहीदों की शहादत की गवाह बनी फतेहपुर की बावनी इमली

फतेहपुर।

गंगा यमुना के बीच बसा उत्तर प्रदेश का फतेहपुर ज‍िला यूं ही गंगा और जमुनी तहजीब के लिए नहीं जाना जाता। विश्व की गौरव गाथा में इसका भी एक अलग स्थान है। ज‍िला मुख्यालय से 36 किलोमीटर की दूरी पर एक ऐसा स्थान है, जहां पर जनपद के 52 शहीदों को अंग्रेजों ने एक साथ फांसी के फंदे पर लटका दिया था।

जिस इमली के पेड़ पर उन क्रांतिवीरों को लटकाया गया था वह आज भी गवाह के तौर पर मौजूद है। यह जगह फतेहपुर जिले की खजुहा तहसील क्षेत्र में स्थित बावनी इमली के नाम से मशहूर है। जो कि प्रथम स्वाधीनता संग्राम के 52 शहीदों की शहादत की गवाह है। फतेहपुर की बावनी इमली का इतिहास देश भक्ति और अंग्रेजी दासता से मुक्ति के लिए किए गए संग्राम में शहादत का स्वर्णिम इतिहास है। 10 मई 1857 को बैरकपुर छावनी में मंगल पांडेय की ओर से बगावत की आग 10 जून को फतेहपुर में धधक उठी। रसूलपुर गांव के ठाकुर जोधा सिंह अटैया जो अंग्रेजी हुकूमत से देश की आजादी का स्वप्न काफी समय से पाले हुए थे अपनी छोटी सी फौज सजाकर अंग्रेजों के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया। जोधा सिंह नाना साहब के करीबी थे।

डिप्टी कलेक्टर हिकमतुल्ला का सहयोग
फतेहपुर के तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर हिकमतुल्ला का सहयोग पाकर सबसे पहले कचेहरी और कोषागार में कब्जा करते हुए क्रांन्तिकारियों ने कचहरी में लगे यूनियन जैक को हटाकर फतेहपुर की आजादी की घोषणा कर दी। हिकमतुल्ला को फतेहपुर का रिसालेदार (चकलेदार) नियुक्त किया गया। फतेहपुर की आजादी की इस घोषणा से ब्रिटिश सरकार में हड़कंप मच गया।

बुंदेलखंड के क्रांतिकारियों ने भी किया था सहयोग
जोधा सिंह ने बुंदेलखंड और अवध के क्रान्तिकारियों से सामंजस्य बिठाकर अपनी ताकत को काफी बढ़ा लिया। जोधा सिंह अटैया के नेतृत्व में क्रान्ति वीरों ने 27 अक्टूबर 1857 को महमूद पुर गांव में ठहरे एक अंग्रेज दरोगा और सिपाही को इन क्रान्तिवीरों ने आग में जलाकर मार डाला। इसके बाद क्रांत‍िकार‍ियों ने गंगापार रानीपुर पुलिस चौकी में धावा मारा और अंग्रेजों के एक पिट्ठू का वध कर डाला। अब तक ब्रिटिश साम्राज्य में फतेहपुर के इन क्रांतिवीरों की दहशत पहुंच गयी थी।

जोधा सिंह अटैया ने कर्नल पावेल को उतारा था मौत के घाट
किसी देशद्रोही की सूचना पर अंग्रेज हुकूमत की ओर से यहां की क्रांति का दमन करने के लिए कर्नल पावेल को भेजा। कर्नल पावेल ने क्रांतिवीरों की टुकड़ी पर हमला किया लेकिन सफलता नहीं मिली। जोधा सिंह अटैया ने गुरिल्ला युद्ध की रणनीति बनाकर कर्नल पावेल को मार डाला। अब अंग्रजों ने कर्नल नील के नेतृत्व में सेना की बड़ी खेप भेज कर जोधा सिंह अटैया की क्रांतिसेना का समूल नाश करने के लिए भेजा।

जोधा सिंह ने अपना ठिकाना फतेहपुर से हटाकर खजुहा बनाया
कर्नल नील ने क्रांतिकारियों को भारी नुकसान पहुंचाया और जोधा सिंह को एक बार फिर छद्म वेष में संगठन और शस्त्र और धन की व्यवस्था करके नए सिरे से अपनी क्रांतिकारी सेना को सजाना पड़ा। अंग्रेजों की तत्काल पहुंच होने के चलते जोधा सिंह ने अपना ठिकाना फतेहपुर से हटाकर खजुहा बना लिया। यह देश का दुर्भाग्य ही था कि देश में भक्तों की कमी नहीं थी तो देश द्रोही भी कुछ कम नहीं थे।

अंग्रेज कर्नल नील ने 51 क्रांतिकारियों को बनाया था बंदी
इसी तरह के एक देशद्रोही ने कर्नल नील को उस समय जोधा सिंह अटैया और उनके साथियों की जानकारी दे दी। जब वह अर्गल नरेश से स्वाधीनता संग्राम के अगले चरण पर विमर्श करके वापस लौट रहे थे। जोधा सिंह को उनके साथियो सहित घोरहा गांव के पास कर्नल नील की घुड़ सवार सेना ने घेर लिया और एक संक्षिप्त संघर्ष के बाद उन्हे अन्य इक्यावन साथियों सहित बन्दी बना लिया गया। बलिदान की प्रेरणा देता है इमली का पेड़तमाम यातनाओं के बाद सभी 52 क्रांत‍िकारियों को 28 अप्रैल 1858 को निरंकुश अंग्रेजों की ओर से बिना किसी सुनवाई या अदालत के आदेश के इमली के पेड़ में एक साथ फांसी पर लटका दिया गया। फतेहपुर के 52 क्रांत‍िकारियों की अमिट शहादत का गवाह इमली का पेड़ आज बावनी इमली के रूप में देश के लिए सर्वस्व बलिदान करने की प्रेरणा दे रहा है।

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