ट्रंप सरकार में बड़ा उलटफेर, तुलसी गबार्ड के इस्तीफे से बढ़ीं राजनीतिक अटकलें

वाशिंगटन

 तुलसी गबार्ड ने अमेरिका के नेशनल इंटेलिजेंस डायरेक्टर पद से इस्तीफा दे दिया है. गबार्ड ने इस्तीफे के पीछे अपने पति को कैंसर होने की पारिवारिक वजह का हवाला दिया है. तुलसी का यह इस्तीफा आगामी 30 जून से प्रभावी हो जाएगा. उनके हटने के बाद अब प्रिंसिपल डिप्टी डायरेक्टर एरॉन लुकास कार्यवाहक डायरेक्टर के तौर पर खुफिया विभाग का जिम्मा संभालेंगे। 

भले ही ट्रंप ने तुलसी गबार्ड के फैसले का सम्मान करते हुए उनकी तारीफों के पुल बांधे हों, लेकिन अमेरिकी सियासी गलियारों में इस इस्तीफे को लेकर कयासों का बाजार बेहद गर्म है. हर कोई यह सवाल पूछ रहा है कि क्या यह वाकई सिर्फ एक पारिवारिक संकट है या फिर इसके पीछे व्हाइट हाउस के भीतर चल रही कोई बड़ी सियासी अनबन? 

ये महज कयास नहीं है बल्कि ऐसे कई तथ्य है जो इस ओर इशारा करते हैं कि ट्रंप और तुलसी के बीच रिश्ते अब पहले की तरह सहज नहीं रहे थे। दरअसल, तुलसी गबार्ड का जाना ट्रंप प्रशासन के लिए एक बड़ा झटका इसलिए भी है, क्योंकि महज दो महीने पहले ही उनके बेहद करीबी सहयोगी और पूर्व नेशनल काउंटरटेररिज्म सेंटर के निदेशक जो केंट ने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। 

तुलसी गबार्ड का इस्तीफा कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि यह ट्रंप कैबिनेट में लगातार हो रहे बदलावों की कड़ी का हिस्सा है. गबार्ड इस साल ट्रंप प्रशासन छोड़ने वाली चौथी कैबिनेट सदस्य बन गई हैं. उनसे ठीक पहले इसी साल अप्रैल में श्रम मंत्री लोरी चावेज-डीरेमर ने अपने पद से किनारा कर लिया था. इतना ही नहीं, होमलैंड सिक्योरिटी मिनिस्टर क्रिस्टी नोएम और अटॉर्नी जनरल पाम बॉन्डी जैसी ताकतवर महिलाएं भी इस साल ट्रंप प्रशासन से अलग हो चुकी हैं। 

बड़े फैसलों से 'गायब' थीं तुलसी, ईरान पर बढ़ गई थी तल्खी
इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए पिछले कुछ महीनों के घटनाक्रम पर नजर डालना जरूरी है. नेशनल इंटेलिजेंस डायरेक्टर जैसे बेहद संवेदनशील और शीर्ष पद पर होने के बावजूद तुलसी गबार्ड पिछले कुछ समय से अमेरिकी सरकार के बड़े फैसलों में कम ही सक्रिय दिखाई दे रही थीं. खासकर ऐसे वक्त में जब अमेरिका ने ईरान और वेनेजुएला जैसे देशों के खिलाफ बेहद कड़े और आक्रामक कदम उठाए, तब खुफिया प्रमुख के तौर पर तुलसी गबार्ड की भूमिका सबसे अहम होनी चाहिए थी, लेकिन वे परिदृश्य से लगभग गायब रहीं। 

यह महज कोई इत्तेफाक नहीं है, बल्कि इसके पीछे ठोस नीतिगत टकराव थे. अपने पूरे राजनीतिक करियर के दौरान तुलसी गबार्ड की छवि एक ऐसी नेता की रही है जो विदेशों में अमेरिकी सेना के हस्तक्षेप और युद्धों का कड़ा विरोध करती आई हैं. ऐसे में जब राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान पर कड़ा रुख अपनाते हुए सैन्य कार्रवाई और हमलों का फैसला किया, तो प्रशासन के भीतर तुलसी गबार्ड के साथ उनका तनाव साफ तौर पर खुलकर सामने आ गया था। 

तुलसी गबार्ड के इस्तीफे पर क्या बोले ट्रंप
वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तुलसी गबार्ड के इस्तीफे पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने ट्रूथ सोशल पर लिखा, 'दुर्भाग्य से, शानदार काम करने के बाद तुलसी गबार्ड 30 जून को प्रशासन छोड़ रही हैं। उनके प्यारे पति अब्राहम को हाल ही में हड्डी के कैंसर का दुर्लभ डायग्नोसिस हुआ है। वे सही मायने में उनके साथ रहना चाहती हैं ताकि उन्हें अच्छा स्वास्थ्य वापस दिला सकें। वे इस कठिन लड़ाई को साथ मिलकर लड़ रहे हैं। मुझे कोई शक नहीं है कि वह जल्द ही पहले से भी बेहतर हो जाएंगे।'

उन्होंने कहा कि तुलसी ने अद्भुत काम किया है और हम उन्हें बहुत मिस करेंगे। उनके बेहद सम्मानित प्रिंसिपल डिप्टी डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस, एरॉन लुकास अब एक्टिंग डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस के रूप में कार्य करेंगे।

तुलसी गबार्ड के बारे में जानिए
तुलसी गबार्ड का जन्म 12 अप्रैल 1981 को अमेरिकन समोआ में हुआ था। उन्होंने हवाई से अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में चार बार सांसद के रूप में काम किया। बाद में उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी छोड़ दी और 2024 के अमेरिकी चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप का समर्थन किया। इसके बाद उन्हें 2025 में अमेरिका की राष्ट्रीय खुफिया निदेशक बनाया गया। तुलसी गबार्ड का भारत से सीधा पारिवारिक संबंध नहीं है, क्योंकि वे भारतीय मूल की नहीं हैं। हालांकि उनका हिंदू धर्म और भारतीय संस्कृति से गहरा जुड़ाव है। उनकी मां हिंदू धर्म से प्रभावित थीं और उन्होंने अपने सभी बच्चों को संस्कृत नाम दिए। तुलसी नाम हिंदू धर्म में पवित्र पौधे से जुड़ा है।

भगवद गीता और वैष्णव परंपरा से प्रभावित
तुलसी गबार्ड बचपन से ही भगवद गीता और वैष्णव परंपरा से प्रभावित रही हैं। वे अमेरिकी कांग्रेस में चुनी जाने वाली पहली हिंदू-अमेरिकी महिला बनीं और उन्होंने शपथ भी भगवद गीता पर ली थी। भारत के साथ उनके रिश्ते राजनीतिक और सांस्कृतिक दोनों स्तरों पर मजबूत रहे हैं। उन्होंने कई बार भारत का दौरा किया और भारत-अमेरिका संबंधों को मजबूत करने की वकालत की। 2014 में उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भगवद गीता की प्रति भेंट की थी। वे अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के समर्थन में भी खुलकर सामने आई थीं। मार्च 2025 में उन्होंने भारत का दौरा कर आतंकवाद और सुरक्षा सहयोग पर भारतीय अधिकारियों से चर्चा की थी। हिंदू पहचान और भारत के प्रति सकारात्मक रुख के कारण भारत में भी उनकी काफी चर्चा होती रही है।

जब ट्रंप ने गबार्ड के दावों को सरेआम किया था खारिज
ट्रंप और तुलसी गबार्ड के बीच की यह तल्खी और असहजता कोई नई बात नहीं है. पिछले साल अमेरिकी कांग्रेस के सामने दोनों के बीच का यह वैचारिक मतभेद पूरी दुनिया ने देखा था। 

गबार्ड ने खुफिया इनपुट्स के आधार पर एक बयान दिया था कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की कोशिश नहीं कर रहा है. लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से अपनी ही खुफिया प्रमुख के इस बयान को खारिज कर दिया था. तब ट्रंप ने कहा था, "मुझे फर्क नहीं पड़ता कि उन्होंने (तुलसी गबार्ड) क्या कहा है. मुझे लगता है कि ईरान परमाणु हथियार बनाने के बेहद करीब था। 

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