दुनिया का सबसे महंगा परमाणु युद्धपोत, फोर्ड क्लास एयरक्राफ्ट कैरियर: 25 साल तक फ्यूल-फ्री, समंदर में आतंक

नई दिल्ली

कल्पना कीजिए समंदर के सीने पर तैरते एक ऐसे लोहे के पहाड़ की जिसके एक इशारे पर दुनिया के किसी भी कोने में तबाही का मंजर बिछाया जा सकता है. यह कोई हॉलीवुड फिल्म का दृश्य नहीं बल्कि अमेरिकी नौसेना का गेराल्ड आर. फोर्ड विमानवाहक पोत है. जब यह 1 लाख टन वजनी दैत्य समंदर की लहरों को चीरता हुआ आगे बढ़ता है तो दुश्मन देशों के रडार कांपने लगते हैं और सैटेलाइट्स की नजरें इसी पर टिक जाती हैं. इसे समंदर का अजेय किला कहना गलत नहीं होगा क्योंकि इसकी सुरक्षा में तैनात मिसाइलें और लेजर गन परिंदे को भी पर मारने की इजाजत नहीं देते. यह सिर्फ एक जहाज नहीं बल्कि अमेरिका का वो घमंड है जिसे चुनौती देने की हिम्मत फिलहाल दुनिया की किसी भी सेना में नहीं है.

फोर्ड क्लास की बेजोड़ खासियतें
फोर्ड क्लास के विमानवाहक पोत अपने पूर्ववर्ती ‘निमित्ज़ क्लास’ से कई गुना उन्नत हैं. इसकी सबसे बड़ी क्रांति EMALS (इलेक्ट्रोमैग्नेटिक एयरक्राफ्ट लॉन्च सिस्टम) है. पहले विमानों को भाप (Steam) के जरिए लॉन्च किया जाता था लेकिन अब शक्तिशाली चुंबकीय तरंगों का उपयोग होता है, जिससे भारी से भारी और हल्के से हल्के (ड्रोन) विमानों को तेजी से लॉन्च किया जा सकता है.

• मारक क्षमता: यह पोत एक दिन में 160 से 220 सॉर्टीज़ (उड़ानें) संचालित कर सकता है. इस पर 75 से अधिक लड़ाकू विमान तैनात रहते हैं, जिनमें F-35C और F/A-18E/F सुपर हॉर्नेट शामिल हैं.

• स्वचालन (Automation): इसमें उन्नत तकनीक के कारण निमित्ज क्लास के मुकाबले 700 से 1,000 कम सैनिकों की जरूरत पड़ती है, जिससे परिचालन लागत कम होती है.

• A1B न्यूक्लियर रिएक्टर: इसमें दो शक्तिशाली परमाणु रिएक्टर लगे हैं जो इसे असीमित रेंज देते हैं. यह 25 साल तक बिना ईंधन भरे समंदर में रह सकता है.

• दोहरी रडार प्रणाली: इसमें ‘डुअल बैंड रडार’ (DBR) लगा है, जो दुश्मन की मिसाइल और विमानों को बहुत दूर से ही ट्रैक कर लेता है.
लागत और मालिकाना हक

फोर्ड क्लास दुनिया का सबसे महंगा सैन्य प्रोजेक्ट माना जाता है. पहले USS Gerald R. Ford (CVN 78) को बनाने में लगभग 13.3 बिलियन डॉलर (करीब 1.1 लाख करोड़ रुपये) की लागत आई है. इसके अलावा इसके अनुसंधान और विकास (R&D) पर अलग से 5 बिलियन डॉलर खर्च किए गए.

किन देशों के पासफोर्ड क्लास की ताकत?
वर्तमान में यह तकनीक केवल संयुक्त राज्य अमेरिका के पास है. अमेरिकी नौसेना ने कुल 10 फोर्ड-क्लास कैरियर बनाने की योजना बनाई है.
1. USS Gerald R. Ford (CVN 78): वर्तमान में सेवा में है.
2. USS John F. Kennedy (CVN 79): परीक्षण के अंतिम चरण में है.
3. USS Enterprise (CVN 80) और USS Doris Miller (CVN 81): निर्माणाधीन हैं.

जियो पॉलिटिक्स: समंदर का ‘सुपरपावर’ संदेश
जियो पॉलिटिक्स में फोर्ड क्लास एक डिप्लोमैटिक टूल की तरह काम करता है. जब भी अमेरिका को किसी देश (जैसे चीन या ईरान) को चेतावनी देनी होती है तो वह उस क्षेत्र में अपना विमानवाहक पोत तैनात कर देता है.

• इंडो-पैसिफिक में चीन को चुनौती: दक्षिण चीन सागर में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए फोर्ड क्लास एक बड़ा हथियार है. यह ताइवान की सुरक्षा और मुक्त व्यापार मार्ग सुनिश्चित करने का प्रमुख जरिया है.

• शक्ति का संतुलन: एक फोर्ड क्लास कैरियर के साथ पूरा ‘कैरियर स्ट्राइक ग्रुप’ चलता है जिसमें विध्वंसक, पनडुब्बियां और क्रूजर शामिल होते हैं. यह किसी छोटे देश की पूरी वायुसेना को अकेले तबाह करने की क्षमता रखता है.

क्या यह भविष्य के युद्धों के लिए तैयार है?
विशेषज्ञों के बीच एक बहस यह भी है कि क्या ‘हाइपरसोनिक मिसाइलों’ के दौर में इतने महंगे जहाज सुरक्षित हैं? चीन और रूस जैसे देश अब कैरियर किलर मिसाइलें विकसित कर रहे हैं. हालांकि, फोर्ड क्लास के पास उन्नत मिसाइल डिफेंस सिस्टम और लेजर हथियारों की क्षमता है जो इसे सुरक्षा कवच प्रदान करती है. फोर्ड क्लास केवल एक जहाज नहीं बल्कि अमेरिकी तकनीकी श्रेष्ठता का प्रतीक है. उच्च लागत के बावजूद यह अमेरिका को वैश्विक शक्ति संतुलन में वह बढ़त देता है जिसे तोड़ पाना फिलहाल किसी भी देश के लिए नामुमकिन है. यह 2026 और उसके बाद के दशकों में अमेरिकी नौसेना की रीढ़ बना रहेगा.

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