साउथ राज्यों के लिए राहत की खबर, परिसीमन पर केंद्र सरकार की रणनीति बन रही आकार

 नई दिल्ली

देश में लोकसभा और विधानसभा की सीटों के राष्ट्रव्यापी परिसीमन को लेकर चर्चाएं तेज हैं। इस परिसीमन के आधार पर लोकसभा और विधानसभा की सीटें बढ़ जाएंगी। इसके अलावा महिला आरक्षण भी इसी के आधार पर लागू होगा। परिसीमन के लिए भौगोलिक क्षेत्र के साथ ही आबादी को भी आधार माना जाता रहा है और उसके अनुसार ही सीटों का आवंटन होता रहा है। लेकिन बीते कुछ सालों से तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल समेत दक्षिण भारत के सभी राज्यों की ओर से चिंता जताई जाती रही है कि उनकी सीटों का अनुपात कम हो सकता है। इसकी बजाय यूपी, बिहार जैसे राज्यों की लोकसभा सीटों का अनुपात और बढ़ सकता है, जो पहले ही अधिक है।

दक्षिण भारत के राज्यों की ओर से यह चिंता जताई जाती रही है कि यदि आबादी के अनुपात को आधार मानते हुए सीटों का आवंटन हुआ तो हमें नुकसान होगा। यही नहीं उत्तर भारत से तुलना करते हुए साउथ के कई नेता कहते रहे हैं कि हमने यदि फैमिली प्लानिंग को अच्छे से लागू किया और आबादी पर नियंत्रण पाया तो उसके लिए परिसीमन में सीटों का अनुपात घटाकर सजा नहीं मिलनी चाहिए। अब जानकारी मिल रही है कि केंद्र सरकार ने दक्षिण भारत के राज्यों की इन चिंताओं पर विचार किया है। खबर है कि सीटों की संख्या भले ही परिसीमन के बाद बढ़ेगी, लेकिन उसके अनुपात में बदलाव नहीं किया जाएगा। इसका अर्थ है कि साउथ के राज्यों की राजनीतिक शक्ति जस की तस रहेगी।

परिसीमन को लेकर जिन प्रस्तावों पर विचार चल रहा है, उनमें से एक यह है कि विधानसभा की सीटों को जनगणना के आंकड़ों के अनुसार बढ़ा दिया जाए। लेकिन राज्यसभा के सदस्यों की संख्या अभी जैसी ही रखी जाए। इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार इस प्रस्ताव को लेकर सरकार का मानना है कि विधानसभा की सीटें बढ़ाना किसी राज्य का आंतरिक मामला है। इसके अलावा राज्यसभा की सीटें तो संसद में सभी राज्यों के प्रतिनिधित्व के लिए ही हैं। ऐसे में लोकसभा की सीटों का अनुपात सही रखना होगा ताकि किसी राज्य को बढ़त मिलती ना दिखे और कोई राज्य कमजोर भी ना नजर आए।
अब तक हुए 4 परिसीमन, 23 साल में क्या-क्या बदल गया

इस पर विचार करते हुए कुलदीप नैयर बनाम भारत सरकार वाले केस का भी जिक्र अधिकारियों ने किया है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्यसभा का मुख्य काम लोकसभा द्वारा लिए गए फैसलों को चेक करना है। इसका एकमात्र अर्थ प्रतिनिधित्व से नहीं है। फिलहाल इस संबंध में एक ऐक्ट बनेगा और फिर परिसीमन होगा। इससे पहले देश में 1952, 1962, 1973 और 2002 में परिसीमन हो चुके हैं। तब से अब तक परिसीमन नहीं हुआ है और इस बीच देश की आबादी और उसके अनुपात में बड़ा बदलाव है। एक अहम चीज यह है कि बीते 23 सालों में शहरी आबादी कहीं ज्यादा हो गई है। इसे लेकर भी सरकार विचार कर रही है कि ग्रामीण इलाकों का प्रतिनिधित्व प्रभावित ना हो।

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