चौंकाने वाला शोध: लगातार जंक फूड खाने से ब्रेन फंक्शन और याददाश्त पर पड़ता है बुरा प्रभाव

नई दिल्ली

ब्रिटेन में प्रोसेस्ड जंक फूड के इंसानी दिमाग पर पड़ने वाले असर से संबंधित रिसर्च में सामने आया कि इस तरह के खाने का ज़्यादा सेवन इंसान के दिमाग के ऐसे हिस्सों में बदलाव कर सकता है जो खाने के व्यवहार को नियंत्रित करते हैं। ऐसा खाना दिमाग के कुछ अहम हिस्सों जैसे – हाइपोथैलेमस, एमीग्डाला और न्यूक्लियस अक्कम्बेन्स में बदलाव कर सकता है। ये हिस्से भूख, संतुष्टि और खाने के प्रति भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करते हैं।

ओवरईटिंग की भी होती है समस्या

इस रिसर्च से यह भी पता चलता है कि प्रोसेस्ड जंक फूड का ज़्यादा सेवन दिमाग के उन क्षेत्रों में संरचनात्मक परिवर्तनों से जुड़ा है जो खाने के व्यवहार को नियंत्रित करते हैं। इससे ओवरईटिंग की भी समस्या होती है।

बढ़ रही बीमारियाँ, सेवन पर ध्यान देने की ज़रूरत

इस रिसर्च से यह सवाल भी उठता है कि क्या अब प्रोसेस्ड जंक फूड पर कड़ी नीतियाँ बनानी चाहिए? वैज्ञानिकों का मानना है कि ज़्यादा प्रोसेस्ड जंक फूड पहले से ही कई बीमारियों जैसे डायबिटीज़, हृदय रोग और मानसिक विकारों से जुड़ा हुआ है। अब दिमाग पर इनके प्रभाव को देखते हुए इनके सेवन पर ध्यान देने की ज़रूरत है।

सिर्फ 4 दिन लगातार खाया जंक फूड तो याददाश्त हो सकती है कमजोर

क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो प्री वीकेंड और पोस्ट वीकेंड सेलिब्रेशन के लिए जंक फूड को तरजीह देते हैं? अगर ऐसा है तो ये खबर आपके लिए है. इन फैटी फूड्स का अगर 4 दिन भी आप नियमित तौर पर सेवन करते हैं तो सतर्क हो जाइए क्योंकि ऐसा कर आप अपने शरीर को ही नहीं ब्रेन को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं. स्टडी बताती है कि इससे कॉग्निटिव डिसफंक्शन (सोचने-समझने की क्षमता पर नकारात्मक असर) का रिस्क बढ़ता है और धीरे-धीरे याददाश्त कमजोर पड़ने लगती है.

स्टडी में क्या पाया गया?

अमेरिका स्थित उत्तरी कैरोलिना विश्वविद्यालय (यूएनसी) के शोध से पता चलता है कि फैटी जंक फूड वजन बढ़ाने या आपको डायबीटिक बनाने से बहुत पहले ही ब्रेन को अटैक करता है यानि इनके नियमित सेवन से सोचने-समझने की क्षमता पर नकारात्मक असर पड़ता है. ये रिजस्ट चेताते और बताते हैं कि हमे मोटापे और याददाश्त को कमजोर करने वाले कारकों पर प्रहार करना चाहिए. जिनमें सबसे पहले नाम आता है वेस्टर्न-स्टाइल जंक फूड का.

न्यूरॉन पत्रिका में प्रकाशित फाइंडिंग से पता चला है कि हिप्पोकैम्पस में ब्रेन सेल्स का एक ग्रुप, जिसे सीसीके इंटरन्यूरॉन्स कहा जाता है, हाई फैट डाइट (एचएफडी) खाने के बाद बहुत ज्यादा एक्टिव हो जाता है. सीसीके इंटरन्यूरॉन्स की सक्रियता का कारण ब्रेन के ग्लूकोज लेने की क्षमता का कमजोर होना है. यूएनसी स्कूल ऑफ मेडिसिन में चीफ इनवेस्टिगेटर और फार्माकोलॉजी के प्रोफेसर जुआन सोंग ने कहा कि यह हाइपरएक्टिविटी हिप्पोकैम्पस द्वारा मेमोरी प्रोसेसिंग करने के तरीके को बाधित करती है.

ये हाइपरएक्टिविटी हाई फैट डाइट (एचएफडी) लेने के कुछ दिनों बाद तक भी जारी रहती है. इस खोज से यह भी पता चला है कि पीकेएम2 नामक एक प्रोटीन इस समस्या को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाता है. दरअसल, ये प्रोटीन ब्रेन सेल्स द्वारा एनर्जी के उपयोग को कंट्रोल करता है.

यूएनसी न्यूरोसाइंस सेंटर के सदस्य सोंग ने कहा, "हम जानते थे कि डाइट और मेटाबॉलिज्म ब्रेन हेल्थ को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन हमें उम्मीद नहीं थी कि हिप्पोकैम्पस में मौजूद सीसीके इंटरन्यूरॉन्स (मस्तिष्क कोशिकाओं के विशिष्ट और कमजोर समूह) मिलेंगे."

सोंग ने आगे कहा, "हमें सबसे ज्यादा आश्चर्य इस बात का हुआ कि ग्लूकोज की कमी होने के बाद इन कोशिकाओं ने तेजी से अपनी एक्टिविटी बदल दी और यह बदलाव ही याददाश्त कमजोर करने के लिए काफी था."
टीम ने ये परीक्षण चूहों पर किया. उन्हें फैटी जंक फूड जैसे हाई फैट वाली डाइट पर रखा. हाई फैट वाली डाइट खाने के 4 दिनों के भीतर परिणामों से पता चला कि मेमोरी के सेंटर में सीसीके इंटरन्यूरॉन्स असामान्य रूप से सक्रिय हो गए.

शोध यह भी दर्शाता है कि ब्रेन में ग्लूकोज को रिलीज करने से वास्तव में एक्स्ट्रा एक्टिव न्यूरॉन्स शांत हो गए और चूहों की स्मृति संबंधी समस्याएं ठीक हो गईं. अध्ययन से पता चलता है कि मोटापा संबंधित न्यूरोडीजेनेरेशन रोकने और ब्रेन हेल्थ को बनाए रखने के लिए खान-पान में बदलाव और कुछ औषधियां सहायक सिद्ध हो सकती हैं. शोधकर्ताओं ने पाया कि हाई-फैट-डाइट के बाद इंटरमिटेंट फास्टिंग से भी फायदा पहुंच सकता है. इससे सीसीके इंटरन्यूरॉन्स सामान्य होते हैं और मेमोरी सुधरती है.

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