राहुल गांधी बीच मझधार में, बिहार चुनाव से पहले कांग्रेस पर साथी दलों का प्रभाव और RJD का रुख

नई दिल्ली

सबको जोड़कर चलने की कोशिश में जुटी कांग्रेस एक बार फिर अकेली पड़ती जा रही है. पीएम-सीएम वाले बिल पर विपक्षी एकता का गुब्बारा फुटने लगा है. पीएम-सीएम को हटाने वाले बिल पर जीपीसी में शामिल होने को लेकर इंडिया ब्लॉक में दो फाड़ नजर आ रहा है. इंडिया गठबंधन के प्रमुख साथियों ने कांग्रेस को फंसा दिया है. जेपीसी मामले पर राहुल गांधी अब बीच मझधार फंस चुके हैं. यहां से वह किस ओर जाएंगे, यह आने वाले वक्त में पता चल जाएगा. दरअसल, भ्रष्टाचार यानी आपराधिक मामलों में कम से कम 30 दिनों तक बिना बेल के जेल में रहने वाले प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों को हटाने वाले बिलों को जेपीसी के लिए भेजा गया है. इस बिल पर विचार करने के लिए बनने वाली जेपीसी यानी संयुक्त संसदीय समिति में शामिल होने को लेकर ही विपक्षी खेमे यानी इंडिया ब्लॉक मतभेद है.

कांग्रेस की क्या प्लानिंग?

ET की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि DMK के TKS एलंगोवन ने कहा कि उनकी पार्टी ने बिल के विरोध करने और उसे दर्ज कराने के लिए जेपीसी में शामिल होने का फैसला लिया है। वहीं कांग्रेस के एक सांसद ने कहा, "हमारे पास यह सोचने के उपयुक्त कारण हैं कि जेपीसी में शामिल होना कैसे उपयोगी हो सकता है।" उन्होंने कहा कि हम हर किसी को बीजेपी के खिलाफ एक साथ ले जाना चाहते हैं।
विपक्षी दल कह रहे JPC बेमतलब

बता दें कि इंडिया गठबंधन में शामिल रही आम आदमी पार्टी ने भी तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की ही तरह जेपीसी में अपने सदस्य नामित नहीं करने का फैसला किया है। हालांकि, वामपंथी दलों ने अपनी स्थिति णअभी स्ष्ट नहीं की है लेकिन माना जा रहा है कि वह इस मुद्दे पर कांग्रेस के साथ है और जेपीसी में अपना विरोध दर्ज कराना चाहते हैं। कई विपक्षी दलों ने कहा है कि इस मुद्दे पर जेपीसी बेमतलब है।

विपक्षी एकता में दरार?

जब संसद में 130वां संविधान संशोधन विधेयक पेश हुआ तब विपक्षी खेमा एकजुट नजर आया था. मगर अब धीरे-धीरे इस एकता की दीवार ढहने लगी है. पीएम-सीएम वाले बिल पर जेपीसी में हिस्सा लेने को लेकर इंडिया ब्लॉक के प्रमुख दलों में गहरी दरार उभर आई है. अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, उद्धव ठाकरे से लेकर अरविंद केजरीवाल तक सबने कांग्रेस को फंसा दिया है. सपा, टीएमसी, आप और उद्धव गुट वाली शिवसेना ने जेपीसी से अलग रहने का फैसला किया है. हालांकि, कांग्रेस ने अब तक जेपीसी में शामिल होने के संकेत दिए हैं. इंडिया गठबंधन के सहयोगियों के इस फैसले ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को बीच मजधार में अकेला छोड़ दिया है. अब कांग्रेस के सामने यह मुसीबत है कि वह अकेले जेपीसी में जाएगी या फिर अन्य साथियों की तरह अलग रहने का ही फैसला लेगी?

क्या है पीएम-सीएम बिल

दरअसल, बीते दिनों संविधान (130वां) संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश हुआ. यह बिल और इसके साथ जुड़े जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन संशोधन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश शासन संशोधन विधेयक में प्रावधान है कि अगर कोई मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री किसी ऐसे अपराध में गिरफ्तार या हिरासत में रहता है, जिसकी सजा पांच साल या उससे अधिक है, और यह हिरासत लगातार 30 दिन तक रहती है, तो वह अपने पद से खुद ब खुद बर्खास्त हो जाएंगे. हालांकि, जेल से आने के बाद वह पद ग्रहण कर सकते हैं. यह विधेयक 20 अगस्त को लोकसभा में पेश हुआ. इस दौरान विपक्षी सांसदों ने इसका विरोध किया. इसके बाद सरकार ने पीएम-सीएम वाले बिल को 31 सदस्यीय जेपीसी यानी संयुक्त संसदीय समिति को भेजने का फैसला किया. जेपीसी में लोकसभा के 21 और राज्यसभा के 10 सदस्य शामिल होंगे.अभी तक इसका गठन नहीं हुआ है.

जानिए किसका क्या स्टैंड

ममता बनर्जी की टीएमसी ने भी जेपीसी से अलग होने का फैसला किया है. टीएमसी का कहना है कि यह बिल भाजपा की ‘राजनीतिक साजिश’ है, जो विपक्ष को फंसाने और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उलझाने का प्रयास है. जेपीसी में शामिल होकर टीएमसी भाजपा के खेल में नहीं पड़ेगी. अखिलेश की समाजवादी पार्टी का भी यही स्टैंड है. खिलेश यादव ने इसे ‘संघीय ढांचे पर हमला’ करार दिया. अखिलेश ने कहा कि यह बिल राज्यों की स्वायत्तता को कमजोर करेगा. हमारा फैसला स्वतंत्र है, और इस मामले में हम कांग्रेस के साथ नहीं चलेंगे.

वहीं, उद्धव गुट वाली शिवसेना ने भी ममता और अखिलेश की राह अपनाई है. उद्धव ठाकरे ने कहा कि विपक्षी एकता चुनावों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। लेकिन इस बिल पर जेपीसी में शामिल होना मतलब भाजपा की रणनीति को वैधता देना है। हम बाहर रहकर जनता के बीच मुद्दा उठाएंगे. शिवसेना नेता संजय राउत का कहना है कि उद्धव ठाकरे को लगता है कि जेपीसी का कोई मतलब नहीं है. वहीं, अरविंद केजरीवाल की आप के सांसद संजय सिंह ने कहा कि पार्टी जेपीसी में शामिल नहीं होगी, क्योंकि ये बिल भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए नहीं, बल्कि विपक्ष के नेताओं को निशाना बनाने के लिए लाया गया है. राजद भी इससे अलग रहने का मन बना रही है.

कांग्रेस फंस गई कांग्रेस?

इस तरह इन चार दलों के फैसले ने कांग्रेस को मुश्किल में डाल दिया है. हालांकि, कांग्रेस ने अभी तक आधिकारिक फैसला नहीं लिया, लेकिन पार्टी सूत्रों के मुताबिक, राहुल गांधी जेपीसी में शामिल होने के पक्ष में हैं, ताकि बिल के कमजोर पक्षों को उजागर किया जा सके. हालांकि, अखिलेश, ममता, अरविंद केजरीवाल और उद्धव ठाकरे के फैसले के बाद कांग्रेस पर दबाव बढ़ गया है. कांग्रेस असमंजस में है. वह क्या करे और क्या नहीं, अभी इस पर मंथन कर रही है. अगर कांग्रेस अकेले जाती है, तो यह इंडिया ब्लॉक की एकता को और कमजोर कर सकता है. साथ ही भाजपा को विपक्ष की कमजोरी का फायदा मिल सकता है. यह स्थिति राहुल गांधी के लिए चुनौतीपूर्ण है और ऐसा लग रहा है कि वह बीच मझधार में हैं. अब देखने वाली बात होगी कि इससे राहुल गांधी कैसे पार पाते हैं.

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