अरावली विवाद की पड़ताल: ‘ग्रेट ग्रीन वॉल’ हटाने से पर्यावरण को कितना खतरा? वायरल दावों का फैक्ट-चेक

नई दिल्ली 
अरावली को लेकर इस समय काफी बवाल मचा हुआ है, सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक लोग इसको बचाने की मुहीम चला रहे हैं। इसको लेकर मुहीम चलाने वाले लोगों का कहना है कि पर्वत बोल ही नहीं रहे, बल्कि रो रहे हैं और इंसान से गुहार लगा रहे हैं हमें बचा लो। खनन, अवैध निर्माण और अंधाधुंध विकास ने अरावली को गहरे जख्म दिए हैं। यही वजह है कि आज Save Aravalli, Save Future, अरावली नहीं तो पानी नहीं और रेगिस्तान रोको, अरावली बचाओ जैसे नारे सड़कों से सोशल मीडिया तक गूंज रहे हैं। ये सिर्फ स्लोगन नहीं, बल्कि उन करोड़ों लोगों और सैकड़ों जीव-जंतुओं की आवाज़ हैं, जिनका जीवन हवा, पानी और हरियाली के लिए अरावली पर निर्भर है।
 
अरावली पर्वतमाला चर्चा में क्यों है?
‘ग्रेट ग्रीन वॉल ऑफ अरावली’ के नाम से जानी जाने वाली यह पर्वतमाला दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में शामिल है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने इसकी कानूनी व्याख्या को लेकर बहस छेड़ दी है। फैसले के अनुसार अब केवल 100 मीटर से अधिक ऊंची पहाड़ियों को ही अरावली के अंतर्गत माना जाएगा। इसका अर्थ यह है कि पहले जो छोटी पहाड़ियां और जंगल इस श्रेणी में आते थे, वे अब इससे बाहर हो सकते हैं। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि जमीन का वर्गीकरण केवल ऊंचाई के आधार पर नहीं, बल्कि रिकॉर्ड, अधिसूचना और जमीनी स्थिति को देखकर तय किया जाएगा।

अरावली को लेकर विवाद क्या है?
विवाद सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर नहीं, बल्कि उसके संभावित उपयोग को लेकर है। अदालत का आदेश कानूनी स्पष्टता देता है, लेकिन इसके अमल की जिम्मेदारी अब राज्य सरकारों और स्थानीय प्रशासन पर है। इस फैसले से जमीन की व्याख्या करने की ताकत राज्यों के हाथ में आ गई है। आशंका यह है कि जिन क्षेत्रों को पहले जंगल जैसा माना जाता था, उन्हें अब राजस्व भूमि या गैर-वन क्षेत्र घोषित किया जा सकता है। अब यह देखना अहम होगा कि राज्य सरकारें रिकॉर्ड तय करने में कितनी पारदर्शिता और पर्यावरणीय सख्ती अपनाती हैं।

अरावली कहां-कहां फैली है?
अरावली पर्वतमाला पश्चिमी भारत की एक प्राचीन श्रृंखला है, जो गुजरात के कच्छ से शुरू होकर राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली हुई है। दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व दिशा में इसकी लंबाई लगभग 800 किलोमीटर है। यह दो अरब वर्ष से भी अधिक पुरानी मानी जाती है और आज भी कई राज्यों के लिए जीवनरेखा बनी हुई है।

क्या अरावली में वन्य जीव भी रहते हैं?
अरावली जैव विविधता से भरपूर क्षेत्र है। यहां भेड़िया, बंगाल लोमड़ी, कैराकल, धारीदार लकड़बग्घा, सियार सहित कई दुर्लभ और लुप्तप्राय प्रजातियां पाई जाती हैं। ये पहाड़ियां न केवल इन जीवों का प्राकृतिक आवास हैं, बल्कि भूजल संरक्षण, वायु शुद्धिकरण और स्थानीय जलवायु संतुलन में भी अहम भूमिका निभाती हैं।

दिल्ली-NCR के लिए अरावली क्यों जरूरी है?
अरावली भूजल रिचार्ज की प्राकृतिक प्रणाली की तरह काम करती है। शोध के अनुसार, यह हर साल प्रति हेक्टेयर लगभग 20 लाख लीटर भूजल रिचार्ज करने में मदद करती है। इसके अलावा यह थार रेगिस्तान को दिल्ली की ओर बढ़ने से रोकने वाली प्राकृतिक दीवार है। यदि अरावली कमजोर होती है, तो दिल्ली-NCR में पानी की कमी बढ़ेगी, कुएं-तालाब सूखेंगे और वायु प्रदूषण व गर्मी का स्तर और बढ़ जाएगा। यह क्षेत्र का प्राकृतिक डस्ट बैरियर और कूलिंग सिस्टम भी है, जिसके बिना ‘अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट’ और गंभीर हो सकता है।

विशेषज्ञों की राय
Green Pencil Foundation के संस्थापक सैंडी खांडा के अनुसार, अगर अरावली को नुकसान पहुंचा तो दिल्ली-NCR का भूजल संकट बेहद गंभीर हो जाएगा। गुरुग्राम, फरीदाबाद और दक्षिण दिल्ली पहले से ही अत्यधिक दोहन झेल रहे हैं। अरावली के खत्म होने से यमुना और अन्य जल स्रोतों पर दबाव और बढ़ेगा।

वहीं ‘सेव अरावली ट्रस्ट’ के पदाधिकारी जितेंद्र भड़ाना का कहना है कि नई परिभाषा से अरावली के बड़े हिस्से के नष्ट होने का खतरा बढ़ गया है। स्वच्छ हवा, जल संतुलन और पर्यावरण सुरक्षा के लिए इस फैसले पर पुनर्विचार जरूरी है।

दिल्ली का कितना हिस्सा अरावली पर स्थित है?
दिल्ली का लगभग 20 से 25 प्रतिशत क्षेत्र अरावली की चट्टानों पर बसा है। दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के महरौली, साकेत, वसंत कुंज और द्वारका के कुछ हिस्से इसी पर्वतमाला का हिस्सा हैं। NCR में गुरुग्राम, फरीदाबाद, मानेसर और दक्षिण सोनीपत के इलाके भी अरावली से जुड़े हैं।

विरोध भी तेज
नई परिभाषा को लेकर गुरुग्राम, राजस्थान और उदयपुर में विरोध देखने को मिला है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह बेहद प्राचीन पर्वत श्रृंखला है और इसमें किया गया कोई भी बदलाव भविष्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। इसी को लेकर गुरुग्राम में मंत्री राव नरबीर सिंह के आवास पर भी प्रदर्शन हुआ।

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