हिन्दी भाषा पाठ्यक्रम का बैगानी और गोंडी बोली में हो रहा अनुवाद

शिक्षा के प्रसार के लिए डिंडोरी के बजाग में नया प्रयोग

जनजातीय विद्यार्थियों को उनकी बोली में प्राथमिक शिक्षा देने का प्रयास

हिन्दी भाषा पाठ्यक्रम का बैगानी और गोंडी बोली में हो रहा अनुवाद

पहली से पांचवीं तक के विद्यार्थियों को पढ़ाई में मिलेगा लाभ

भोपाल

जनजातियों की देशज कला, संस्कृति, वानस्पतिक ज्ञान और जड़ी-बूटी रोग उपचार कौशल के संरक्षण और संवर्धन के लिए केन्द्र और मध्यप्रदेश सरकार विभिन्न कदम उठा रही हैं। जनजातियों की अपनी बोलियां होती हैं। वे अपनी बोली में ही बात करना पसंद करते हैं। ज्ञान अर्जन हो या तथ्यों को समझने की बात हो, जनजातीय समुदाय अपनी बोली में ही ज्यादा सहज होते हैं। जनजातियों के इसी मानस को समझकर केन्द्र एवं राज्य सरकार ने अब जनजातीय वर्ग के विद्यार्थियों को उनकी बोली में प्राथमिक शिक्षा देने का मन बना लिया है। इस काम की शुरुआत ट्राईबल डामिनेटेड डिंडोरी जिले से की जा रही है।

यहां विशेष रूप से पिछड़ी और आर्थिक रूप से कमजोर मानी जाने वाली (पीजीटीजी समूह की) बैगा जनजाति के अलावा गोंड जनजाति की बड़ी आबादी रहती है। जन सांख्यिकीय अनुपात में इन जनजातियों के बड़ी संख्या में विद्यार्थी स्कूली शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इन्हीं विद्यार्थियों के हित में डिंडोरी जिले के बजाग ब्लॉक में एक अनोखा और प्रेरणादायक कदम उठाया जा रहा है। अत्यंत पिछड़ी बैगा जनजाति की विलुप्त होती बोलियां और संस्कृति को पुनर्जीवित करने के लिए प्राथमिक स्तर पर पहली से पांचवीं तक के छात्रों के लिए हिन्दी भाषा के पाठ्यक्रम का बैगानी और गोंडी बोली में अनुवाद किया जा रहा है। यह नवाचार न केवल शिक्षा को सरल और सुलभ बनाएगा, बल्कि जनजातीय छात्रों के बौद्धिक और सांस्कृतिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

बोली संरक्षण के लिए बड़ा कदम

कार्य योजना के तहत हिंदी भाषा में तैयार विषयवार पाठ्यपुस्तकों को बैगानी और गोंडी बोली की शब्दावली में अनुवादित किया जा रहा है। विशेष रूप से हिंदी, गणित और पर्यावरण विज्ञान विषयों पर जोर दिया गया है, जबकि अंग्रेज़ी भाषा को पाठ्यक्रम से बाहर रखा गया है। जनजातीय कार्य विभाग के अधीन ट्राईबल रिसर्च एंड डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट (टीआरआई) भोपाल की पहल पर इस परियोजना को राज्य शिक्षा केंद्र के माध्यम से संचालित किया जा रहा है। बैगानी बोली के संरक्षण और शिक्षा में उपयोग के लिए शब्दकोश से शब्दों का संग्रह किया गया है। यह प्रयास जनजातीय छात्रों को उनकी ही बोली में सुलभ शिक्षा देने का अनूठा प्रयास है। यह बैगा जनजाति की बोली और सांस्कृतिक धरोहर को भी संरक्षित करेगा।

शिक्षकों और विशेषज्ञों की टीम

कार्य योजना को सफलतापूर्वक लागू करने के लिए 35 शिक्षकों और भाषा/बोली विशेषज्ञों की टीम बनाई गई है। ये शिक्षक दो शिफ्टों में काम करते हुए हिंदी भाषा के पाठ्यक्रम को बैगानी और गोंडी बोली की शब्दावली में अनुवादित कर रहे हैं। परियोजना का लगभग 55 प्रतिशत से अधिक काम पूरा हो चुका है। इसे अगले शैक्षणिक सत्र से लागू करने की योजना है। शासकीय कन्या शिक्षा परिसर, बजाग के ऑडिटोरियम हॉल में छह मेजों पर इस कार्य को अंजाम दिया जा रहा है। विशेषज्ञ शिक्षक हर शब्द और वाक्य की बारीकी से समीक्षा कर रहे हैं, ताकि पाठ्यक्रम जनजातीय छात्रों की समझ और उनकी संस्कृति के अनुरूप ही हो।

उम्मीदों का उज्जवल भविष्य

जनजातीय कार्य, लोक परिसम्पति प्रबंधन तथा भोपाल गैस त्रासदी राहत एवं पुनर्वास मंत्री डॉ. कुंवर विजय शाह ने बताया कि जनजातियों की बोलियों के संरक्षण के लिए केन्द्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय के साथ मिलकर राज्य सरकार पूरा प्रयास कर रही है। डिंडोरी जिले में बैगानी और गोंडी बोली में पाठ्यक्रम का अनुवाद एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में किया जा रहा है। सफल होने पर अन्य जनजातीय क्षेत्रों में भी लागू किया जा सकेगा। इस नवाचार से न केवल बोलियों और संस्कृति के संरक्षण में मदद मिलेगी, बल्कि बैगा जनजाति के सभी विद्यार्थियों में आत्मविश्वास का संचार होकर उनका बौद्धिक विकास भी होगा।

उन्होंने बताया कि वर्ष 2008 में डिंडोरी जिले (बैगांचल) के वन्या रेडियो केंद्र, चांडा ने भी बैगानी बोली में कार्यक्रम प्रसारित किए थे। अब इस योजना के माध्यम से वही प्रयास और अधिक बेहतर स्वरूप में क्रियान्वित किया जा रहा है। जिले के लिए यह कदम न केवल शैक्षणिक विकास, वरन् संस्कृति संरक्षण के लिए भी मील का पत्थर साबित होगा। इस अनूठी पहल से बैगा जनजाति की आने वाली पीढ़ियां अपनी कला, संस्कृति, बोली और पहचान से जुड़ी रहेंगी।

डिंडोरी जिले में इस कार्य के नोडल अधिकारी धनेश परस्ते बताते हैं कि हमने बैगानी और गोंडी बोली की शब्दावली तैयार कर ली है। हम हिन्दी भाषा के पाठ्यक्रम को जिले की जनजातियों की सामान्य बोलचाल की भाषा में अनुवादित कर रहे हैं। चूंकि यहां की जनजातियां मुख्यतः बैगा और गोंडी बोली में सहज होकर वार्तालाप करती हैं, इसीलिए हम टीआरआई के मार्गदर्शन में आंगनवाड़ी में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों और प्रायमरी कक्षाओं के पाठ्यक्रमों का इन्हीं दो बोलियों में अनुवाद कर रहे हैं। हम जल्द ही यह काम पूरा कर लेंगे।

 

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