DRDO ने खोला दरवाजा: F-35 और Su-57 होंगे obsolete, राफेल की जरूरत नहीं, THAAD और S-400 भी नाकाम

बेंगलुरु 

21वीं सदी में युद्ध के तौर-तरीके भी बदल चुके हैं. पैदल सेना का महत्‍व काफी सीमित हो चुका है. एयरफोर्स और नेवी की भूमिका बेहद अहम हो चुका है. सन् 1971 में इंडियन नेवी का ‘ऑपरेशन टा्रइडेंट’ हो या फिर मई 2025 का इंडियन एयरफोर्स का ऑपरेशन सिंदूर, वायुसेना और नौसेना ने दुश्‍मनों को ऐसा सबक सिखाया कि वे ताउम्र याद रखेंगे. बालाकोट एयर स्‍ट्राइक के बाद ऑपरेशन सिंदूर में एयरफोर्स ने अपने जौहर से पूरी दुनिया को चकित कर दिया. सफल ऑपरेशन के बाद तीन बड़े डेवलपमेंट हुए हैं. पहला, हाइपरसोनिक मिसाइल पर फोकस बढ़ गया है. दूसरा, ताकतवर और अत्‍याधुनिक एयर डिफेंस सिस्‍टम को विकसित करने पर ज्‍यादा ध्‍यान दिया जाने लगा है. तीसरा, अल्‍ट्रा मॉडर्न फाइटर जेट (5th और 6th जेनरेशन फाइटर जेट) के डेवलपमेंट से जुड़े प्रोजेक्‍ट में काफी तेजी लाई गई है.

भारत एक तरफ पांचवीं पीढ़ी का फाइटर जेट इंपोर्ट करने पर गंभीरता से विचार कर रहा है तो दूसरी तरफ AMCA प्रोजेक्‍ट लॉन्‍च कर फिफ्थ जेन कॉम्‍बैट एयरक्राफ्ट देसी तकनीक से डेवलप करने में भी जुटा है. इन सब डेवलपमेंट के बीच रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने 6th जेनरेशन फाइटर जेट डेवलप करने वाली तकनीक डेवलप करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. यदि यह प्रोजेक्‍ट सफल रहता है तो वो दिन दूर नहीं जब भारत के पास देसी टेक्‍नोलॉजी से डेवलप 6th जेनरेशन फाइटर जेट होगा, जिसके सामने F-35 और Su-57 जैसे पांचवीं पीढ़ी के विमान भी पानी भरेंगे.

दरअसल, DRDO के अंतर्गत आने वाले रिसर्च सेंटर इमरात (RCI) ने 6th जेनरेशन वॉरफेयर के लिए जरूरी क्‍वांटम एव‍ियोनिक्‍स सेंसर डेवलप करने के लिए प्राइवेट सेक्‍टर को औपचारिक रूप से इन्‍वाइट किया है. इस टेक्‍नोलॉजी के डेवलप होने पर भारत के लिए 6th जेनरेशन फाइटर जेट बनाना बेहद आसान हो जाएगा. बता दें कि 6th जेनरेशन फाइटर जेट किसी भी अल्‍ट्रा मॉडर्न रडार सिस्‍टम को चकमा देने में सक्षम है. साथ ही एयर डिफेंस सिस्‍टम के चक्रव्‍यू को तोड़ना भी इसके लिए कोई बड़ी बात नहीं होगी. रडार क्रॉस सेक्‍शन यानी RCS काफी कम होने की वजह से 6th जेनरेशन फाइटर जेट का रडार की पकड़ में आना फिलहाल असंभव जैसा है.

‘इंडिया डिफेंस रिसर्च विंग’ की रिपोर्ट के अनुसार, RCI ने भारतीय निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स को क्वांटम आधारित एवियोनिक सेंसर विकसित करने के लिए औपचारिक तौर पर आमंत्रित किया है. यह तकनीक भविष्य के छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की “कोर टेक्नोलॉजी” मानी जाती है. अब सवाल उठता है कि क्वांटम एवियोनिक्स क्या है? दरअसल, क्वांटम तकनीक वह क्षमता देती है, जिससे विमान GPS बंद होने, कम्युनिकेशन जाम होने या दुश्मन के उन्नत रडार सक्रिय होने जैसी स्थिति में भी सटीक दिशा, दूरी और दुश्मन की लोकेशन के बारे में जानकारी हासिल की जा सके. फिलहाल अभी तक किसी भी जेट में यह तकनीक नहीं है.

RCI किन तकनीकों पर काम कर रहा है?

RCI तीन प्रमुख क्वांटम क्षेत्रों पर तेजी से काम कर रहा है -:

    क्वांटम इनर्शियल नेविगेशन: बिना GPS के भी सेंटीमीटर स्तर की सटीक दिशा व लोकेशन.
    क्वांटम मैग्नेटोमीटर: बेहद हल्के चुंबकीय बदलाव पकड़कर स्टील्थ विमान, पनडुब्बियां या जमीन में छिपे विस्फोटक खोजने की क्षमता.
    क्वांटम रडार/लिडार: एंटैंगल्ड फोटॉन तकनीक से ऐसे स्टील्थ विमान भी दिखा सकता है जिन्हें सामान्य रडार नहीं पकड़ पाते.

DRDO के कदम से भारत ग्‍लोबल एविएशन सेक्‍टर में एक बड़ा प्‍लेयर बन सकता है. एफ-35 जैसे फिफ्थ जेनरेशन के फाइटर जेट से ज्‍यादा ताकतवर विमान डेवलप करने की प्रक्रिया का यह पहला कदम है.
क्या होगा फायदा?

    जैम या स्पूफ न होने वाला नेविगेशन
    स्टील्थ विमानों की दूर से पहचान
    विमान से ही पनडुब्बियों और भूमिगत खतरों का पता
    कम्युनिकेशन बंद होने पर भी फॉर्मेशन में उड़ान

प्राइवेट सेक्‍टर को क्‍यों किया इन्‍वाइट?

इन क्वांटम सेंसरों को लड़ाकू विमान में लगाने के लिए उन्हें बेहद मजबूत, तापमान सहने योग्य और छोटे आकार में बनाना होगा. यह बड़ा तकनीकी चुनौती है, इसलिए RCI ने पहली बार निजी कंपनियों को TDF और iDEX जैसे प्रोग्रामों के तहत साथ जुड़ने के लिए बुलाया है. क्वांटम तकनीक के लिए जरूरी क्षेत्रों जैसे अल्ट्रा हाई वैक्यूम सिस्टम, फोटॉनिक चिप्स, सिंगल-फोटॉन डिटेक्टर और क्रायोजेनिक कूलिंग के क्षेत्र में भारतीय स्टार्टअप पहले से ही अच्छा काम कर रहे हैं. RCI इन्हीं कंपनियों के साथ साझेदारी कर तकनीक को आगे बढ़ाना चाहता है. RCI का लक्ष्य अगले कुछ वर्षों में ऐसे क्वांटम सेंसर तैयार करना है, जिन्हें भारत के भावी लड़ाकू विमानों और शुरुआती चरण में बन रहे छठी पीढ़ी के प्लेटफॉर्म में इस्‍तेमाल किया जा सके.

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