दिग्विजय का खुलासा: UGC ने हटाई सजा, झूठे आरोपों का दुष्प्रचार किया जा रहा

भोपाल 

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए इक्विटी रेगुलेशंस 2026 को लेकर देशभर के विश्वविद्यालय परिसरों में असंतोष बढ़ता जा रहा है। खासकर सवर्ण (जनरल कैटेगरी) छात्रों और शिक्षकों के एक वर्ग ने नियमों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

इस बीच कांग्रेस नेता और राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने पूरे विवाद पर विस्तार से सफाई देते हुए कहा है कि संसदीय स्थायी समिति की सिफारिशों को लेकर भ्रम फैलाया जा रहा है, जबकि कई अहम सुझावों को UGC ने खुद नजरअंदाज किया है।

नए इक्विटी रेगुलेशंस की पृष्ठभूमि

दिग्विजय सिंह के मुताबिक, फरवरी 2025 में रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं की पहल और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद केंद्र सरकार और UGC ने उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव रोकने के लिए ड्राफ्ट इक्विटी रेगुलेशंस जारी किए थे। इसका उद्देश्य कैंपस में जाति, सामाजिक पृष्ठभूमि और अन्य आधारों पर होने वाले भेदभाव को रोकना था।

दिसंबर 2025 में शिक्षा पर संसदीय स्थायी समिति ने इन ड्राफ्ट नियमों की समीक्षा कर एक सर्वसम्मत रिपोर्ट संसद में रखी। समिति ने माना कि नियम सही दिशा में हैं, लेकिन उन्हें और सख्त व स्पष्ट बनाए जाने की जरूरत है।

संसदीय समिति की प्रमुख सिफारिशें क्या थीं?

समिति ने विशेष रूप से पांच अहम सुझाव दिए,

    ओबीसी छात्रों और अन्य हितधारकों के उत्पीड़न को भी जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा में स्पष्ट रूप से शामिल किया जाए।
    दिव्यांगता को भी भेदभाव के आधार के रूप में मान्यता दी जाए।

    इक्विटी कमेटी की संरचना बदली जाए, ताकि 10 सदस्यों वाली समिति में एससी, एसटी और ओबीसी का प्रतिनिधित्व 50 प्रतिशत से अधिक हो और निर्णय निष्पक्ष हों।

    भेदभाव की स्पष्ट पहचान और उदाहरण नियमों में लिखे जाएं, ताकि किसी मामले को संस्थान मनमाने ढंग से सही या गलत न ठहरा सके।
    हर साल जातिगत भेदभाव के मामलों का सार्वजनिक खुलासा, फैकल्टी और प्रशासन के लिए अनिवार्य संवेदनशीलता प्रशिक्षण, और छात्रों के लिए मानसिक स्वास्थ्य सहायता व कानूनी मदद सुनिश्चित की जाए।

UGC ने क्या माना और क्या छोड़ा?

जनवरी 2026 में UGC ने अंतिम इक्विटी रेगुलेशंस जारी किए। दिग्विजय सिंह के अनुसार, UGC ने ओबीसी को शामिल करने, दिव्यांगता को भेदभाव के आधार मानने और वार्षिक रिपोर्ट, ट्रेनिंग व सहायता जैसे प्रावधानों को स्वीकार कर लिया।

लेकिन, इक्विटी कमेटी में एससी-एसटी-ओबीसी प्रतिनिधित्व बढ़ाने और भेदभाव की विस्तृत परिभाषा तय करने जैसी सिफारिशों को UGC ने नजरअंदाज कर दिया।

सवर्ण वर्ग की आपत्तियां क्या हैं?

नए नियमों के खिलाफ हो रहे विरोध का बड़ा हिस्सा सवर्ण छात्रों और शिक्षकों से जुड़ा है। उनकी मुख्य आपत्तियां दो बिंदुओं पर केंद्रित हैं

1. झूठे मामलों पर सजा का प्रावधान हटना: ड्राफ्ट नियमों में झूठी शिकायत दर्ज कराने पर दंड का प्रावधान था, जिसे अंतिम नियमों से हटा दिया गया। सवर्ण छात्रों का कहना है कि इससे फर्जी जातिगत भेदभाव के मामलों की बाढ़ आ सकती है, जिसका इस्तेमाल दबाव बनाने या बदले की भावना से किया जा सकता है।

2. जनरल कैटेगरी को सूची से बाहर रखना: नियमों में जातिगत भेदभाव के शिकार के रूप में केवल एससी, एसटी और ओबीसी का उल्लेख है। सवर्ण वर्ग का तर्क है कि इससे यह संदेश जाता है कि जातिगत भेदभाव करने वाला केवल जनरल कैटेगरी ही होता है, जबकि भेदभाव किसी भी वर्ग के साथ हो सकता है।
दिग्विजय सिंह ने की सफाई

दिग्विजय सिंह ने स्पष्ट किया कि झूठे मामलों पर सजा हटाने का फैसला UGC का अपना था, इसका संसदीय समिति से कोई संबंध नहीं है। जनरल कैटेगरी को सूची से बाहर रखने पर भी समिति ने कोई टिप्पणी नहीं की थी। यह निर्णय भी पूरी तरह UGC का है।

उन्होंने कहा कि यदि UGC ने भेदभाव की स्पष्ट परिभाषा और उदाहरण तय कर दिए होते, तो इससे न केवल वंचित वर्गों को सुरक्षा मिलती बल्कि फर्जी मामलों की आशंका भी काफी हद तक कम हो जाती। यही बात संसदीय समिति ने कही थी, लेकिन उसे अनदेखा कर दिया गया।

अब समाधान किसके हाथ में?

दिग्विजय सिंह के मुताबिक, मौजूदा गतिरोध को खत्म करने की जिम्मेदारी अब पूरी तरह UGC और शिक्षा मंत्रालय पर है। उन्होंने कहा कि नियमों को लेकर जो भ्रम फैला है, उसे दूर किए बिना कैंपस का माहौल सामान्य नहीं हो सकता।

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