युवाओं को लुभा रहा है ब्रांड मैनेजमेंट

किसी खास उत्पाद, उत्पाद लाइन या ब्रांड में मार्केटिंग तकनीकों के अनुप्रयोग को ब्रांड मैनेजमेंट कहते हैं। इसका उपयोग उत्पाद की उपभोक्ताओं में प्रचलित वेल्यू को बढ़ाने के लिए किया जाता है, जिससे ब्रांड फ्रेंचाइज के साथ-साथ ब्रांड इक्विटी भी बढ़ती है।

सामान्यतः बाजारों में मार्केट्स द्वारा किसी भी ब्रांड को एक ऐसे आश्वासन के रूप में माना जाता है, जिसकी गुणवत्ता के स्तर की ग्राहकों को अपेक्षा होती है। इसी गुण के आधार पर ब्रांड वेल्यू तय होती है, जो भविष्य की खरीदी में निर्णायक भूमिका निभाती है। इसके द्वारा प्रतिस्पर्धी उत्पादों से अपने उत्पाद की तुलना कर विक्रय बढ़ाया जाता है। जैसे कि मेरी शर्ट से इसकी शर्ट सफेद क्यों? ब्रांड वेल्यू के आधार पर ही निर्माता अपने उत्पाद की अधिक कीमत वसूल करता है।

ब्रांड की वेल्यू का निर्धारण निर्माता के लिए निर्मित लाभ की राशि के आधार पर किया जाता है। इसे विक्रय में वृद्धि तथा कीमत में वृद्धि कर हासिल किया जा सकता है अथवा बेचे जाने वाले उत्पाद की लागत घटाकर भी प्राप्त किया जा सकता है। अधिक प्रभावी मार्केटिंग निवेश से भी यह प्राप्त होता है। इन सभी कयासों से किसी ब्रांड की लाभप्रदता बढ़ाई जा सकती है और इस तरह ब्रांड मैनेजर किसी भी ब्रांड की लाभ-हानि के जिम्मेदार होते हैं। इस संदर्भ में ब्रांड मैनेजमेंट की रणनीतियुक्त भूमिका मार्केटिंग से अधिक व्यापक होती है।

ब्रांडनेम की विशेषताएं…
-किसी भी ब्रांडनेम में निम्नलिखित विशेषताएं होना चाहिए
-उसे ट्रेडमार्क कानून के तहत संरक्षित किया जाना चाहिए या वह कम से कम ऐसा होना चाहिए कि जिसे संरक्षित रखा जा सके।
-ब्रांडनेम उच्चारण करने में आसान होना चाहिए।
-ब्रांडनेम आसानी से याद रखने लायक होना चाहिए।
-ब्रांडनेम आसानी से पहचाना जा सकने जैसा होना चाहिए।
-ब्रांडनेम बाजारों में जहां ब्रांड का उपयोग किया जाएगा, वह सभी भाषाओं में अनुवादित करने लायक होना चाहिए।
– ब्रांडनेम से कंपनी या उत्पाद का अनुमान लग जाना चाहिए।
-ब्रांडनेम आकर्षक होना चाहिए।

ब्रांडों की किस्में:- बाजार में कई किस्मों के ब्रांड उपलब्ध हैं। आमतौर पर प्रीमियम ब्रांड की कीमत उसी श्रेणी के अन्य ब्रांडों से ज्यादा होती है, जबकि इकॉनॉमी ब्रांड बाजार के आम ग्राहकों को लक्षित होता है। फाइटिंग ब्रांड को विशेष रूप से प्रतिस्पर्धात्मक खतरों का सामना करने के लिए बनाया जाता है।

जब किसी कंपनी का नाम उत्पाद के ब्रांड नाम के रूप में उपयोग में लाया जाता है, उसे फैमेली ब्रांडिंग कहा जाता है। जब कंपनी के सभी उत्पादों को अलग-अलग ब्रांडनेम दिए जाते हैं, उसे इनडिविजुअल अथवा वैयक्तिक ब्रांड कहकर पुकारा जाता है।

जब कोई कंपनी नए ब्रांड को प्रस्तुत करने के लिए मौजूदा ब्रांड के साथ ब्रांड इक्विटी का उपयोग करती है, उसे ब्रांड लिवेरेजिंग कहा जाता है। जब कोई बड़ा रिटेलर किसी निर्माता से थोक मात्रा में कोई उत्पाद खरीदकर उन पर अपना ब्रांडनेम डाल देता है, उसे प्राइवेट ब्रांडिंग, स्टोर ब्रांड, व्हाइट लेबलिंग, प्राइवेट लेबल या ओन ब्रांड (यूके) कहा जाता है। प्राइवेट ब्रांडों को निर्माता के ब्रांडों से अलग किया जा सकता है।

जब दो या अधिक ब्रांड अपने उत्पाद को मार्केट करने के लिए एकसाथ काम करते हैं, इसे को-ब्रांडिंग कहा जाता है। कोई भी एम्प्लायमेंट ब्रांड तब निर्मित होता है, जब कोई कंपनी संभावित प्रत्याशियों के साथ जागरूकता निर्मित करना चाहती है। कई मामलों में यह ब्रांड उनके ग्राहकों के लिए एक अटूट विस्तार बन जाता है।

क्या होता है ब्रांड आर्किटेक्चर:- किसी कंपनी के स्वामित्व वाले अलग-अलग किस्म के ब्रांड ब्रांड आर्किटेक्चर के माध्यम से एक-दूसरे से संबंधित होते हैं। प्रॉडक्ट ब्रांड आर्किटेक्चर में कंपनी कई अलग-अलग उत्पादों को सहायता प्रदान करती है, जिसमें प्रत्येक उत्पाद का अपना एक अलग नाम तथा उसे अभिव्यक्त करने की शैली जुदा होती है, लेकिन ग्राहकों को कंपनी कहीं भी दिखाई नहीं देती है।

कई लोगों का मानना है कि प्रॉक्टर एंड गैम्बल उत्पाद ब्रांडिंग का निर्माण करती है, जबकि टाइड, पैम्पर्स, आइवोरी तथा पेंटिन जैसे कई कंजूमर ब्रांडों का आपस में कोई संबंध नहीं है। कंपनी कुछ ब्रांडों के साथ अपना नाम इसलिए भी जोड़ देती है, ताकि उन्हें मदर ब्रांड का फायदा मिल सके और कंपनी का मार्केटिंग खर्च बच सके। तीसरे मॉडल में सारे उत्पादों के साथ ब्रांड नेम का ही उपयोग किया जाता है और सारे विज्ञापन एक स्वर में इसके गुणगान करते हैं।

ब्रांड आर्किटेक्चर का एक अच्छा उदाहरण है यूके स्थित सम्पिण्डित वर्जिन। वर्जिन द्वारा अपने सारे उत्पादों के साथ वर्जिन का उपयोग किया जाता है जैसे कि वर्जिन मेगास्टोर, वर्जिन एटलांटिक, वर्जिन ब्राइडस आदि। इन सारे उत्पादों के साथ एक ही स्टाइल में वर्जिन को प्रदर्शित किया जाता है, ताकि दूर से भी देखने वाला इसे पहचान सके।

ब्रांड तकनीक:- कभी-कभी कंपनियां उनके द्वारा मार्केट करने वाले ब्रांडों की संख्या घटाना चाहती है। इस प्रक्रिया को ब्रांड राशनेलाइजेशन कहा जाता है। कुछ कंपनियों की प्रवृत्ति ब्रांड के अंदर ही ज्यादा ब्रांड तथा उत्पाद अंतर निर्मित करने की होती है। कभी-कभी वह लक्षित प्रत्येक बाजारों के लिए कतिपय विशिष्ट सेवा अथवा उत्पाद ब्रांड का निर्माण करेंगी। प्रॉडक्ट ब्रांडिंग के मामले में इसका उद्देश्य खुदरा विक्रेताओं को लाभान्वित करना है।

चुनौतियां ब्रांड मैनेजरों की:– ब्रांड मैनेजरों के सामने ये चुनौतियां लगातार बढ़ती जा रही हैं कि ब्रांड के संदेश को ताजा तथा प्रासंगिक बनाए रखते हुए एकसंगत ब्रांड का निर्माण करें। पुराने ब्रांड की पहचान परिष्कृत बाजारों के साथ जोड़ने से गड़बड़ी हो सकती है। इसके लिए उसे दोबारा विजन स्टेटमेंट तथा मिशन स्टेटमेंट आरंभ करने की आवश्यकता होगी। इससे जनसांख्यिकीय विकास से उनके लक्षित बाजार में ब्रांड पहचान गुम हो सकती है। इसके लिए ब्रांड को दोबारा स्था पित करने की आवश्येकता होती है। इस प्रक्रिया को रिब्रांडिंग कहा जाता है।

क्याय करता है ब्रांड मैनेजर:- ब्रांड मैनेजर का सबसे पहला काम अपने उत्पारद को इस तरह से निर्मित करना है कि वह उपभोक्ताहओं के बीच आसानी से लोकप्रिय हो जाए तथा उत्पातद की पहचान बन जाए। कभी-कभार ब्रांड मैनेजर अपना कार्य सीमित कर वित्तीय और बाजार के निष्पाएदन लक्ष्यों  पर ज्यानदा ध्याबन देते हैं। अधिकांश ब्रांड मैनेजर अल्प कालीन लक्ष्यर निर्धारित करते हैं, क्योंिकि उपनका कंपनसेशन पैकेज अल्प कालीन व्यपवहार के लिए ही उपयुक्त होता है। अल्पलकालीन लक्ष्यों  को दीर्घकालीन लक्ष्यों  की दिशा में मील के पत्थवर के रूप में देखा जाता चाहिए। किसी ऐसी कंपनी में जो अलग-अलग तरह के उत्पाीदों पर कार्य करती है, वहां कुछ ब्रांडों का दूसरे ब्रांडो से टकराव होने लगता है। इसके लिए कॉर्पोरेट लक्ष्यर काफी व्यायपक होना चाहिए, ताकि टकराव की संभावना को टाला जा सके।

खुल जाते हैं जॉब के रास्ते:- करियर काउंसल परवीन मल्होत्रा कहती हैं कि ब्रांड मैनेजमेंट कोर्स पूरा करने के बाद स्टूडेंट्स के लिए कई रास्ते खुल जाते हैं। वे प्रोडक्ट मैनेजर या ब्रांड डेवलपमेंट मैनेजर के रूप में कार्य की शुरुआत कर सकते हैं। आमतौर पर कोर्स पूरा करने का बाद स्टूडेंट्स का प्लेसमेंट हिन्दुस्तान लीवर, मंहिद्रा ऐंड मंहिद्रा, गोदरेज, सन फार्मा, आदित्य बिरला ग्रुप, रिलायंस, डाबर, बजाज, एफएमसीजी कंपनी, नेस्ले, सिप्ला, कोका-कोला, फार्मास्युटिकल कंपनी, हेल्थकेयर आदि में हो जाती है। इन दिनों फार्मा सेक्टर में ब्रांड मैनेजमेंट से जुड़े लोगों की खूब मांग देखी जा रही है। पिरामल हेल्थकेयर बद्दी, हिमाचल प्रदेश में क्वालिटी कंट्रोल के हेड शैलेंद्र कुमार कहते हैं कि फार्मा इंडस्ट्री में ब्रांड मैनेजमेंट से जुड़े लोगों के लिए करियर इसलिए भी बेहतर है, क्योंकि फार्मा कंपनियां कोई न कोई प्रोडक्ट आए दिन मार्केट में उतारती ही रहती हैं। खाकसर जब कोई नया प्रोडक्ट मार्केट में उतारा जाता है, तो बिक्री बढ़ाने और प्रमोशन के लिए ब्रांड मैनेजर की जरूरत होती ही है।

कम्युनिकेशन स्किल:- ब्रांड से जुड़े लोगों का काम प्रोडक्ट की छवि को मार्केट में बेहतर बनाने का होता है, इसलिए अच्छी कम्युनिकेशन स्किल की जरूरत होती है। साथ ही, मार्केट की स्थिति को भांपते हुए हर वक्त एलर्ट रहना चाहिए। सफल ब्रांड मैनेजर बनने के लिए क्रिएटिव माइंडेड होना बेहद जरूरी है। इसके अलावा, मार्केट रिसर्च, एनालिसिस, सेल्स और प्रमोशनल प्लानिंग जैसी स्किल भी जरूर होनी चाहिए।

आकर्षक सैलरी:- ब्रांड मैनेजर का जॉब काफी शानदार होती है और इसपर कंपनी का काफी दामोदार होता है। यही वजह है कि इनकी सैलरी भी काफी अछी होती है। शुरुआती दौर में आपकी सैलॅरी 10 से 15 हजार रुपये हो सकती है। लेकिन अनुभव और कामयाबी हासिल करने के बाद आपकी कमाई लाखों में हो सकती है।

प्रमुख संस्थान…

-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (कोलकाता, अहमदाबाद, बेंगलुरु, लखनऊ, इंदौर)

-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस ऐंड मैनेजमेंट, रांची

-सिम्बायोसिस इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज, पुणे

-एसपी जैन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट ऐंड रिसर्च, मुंबई

-जेवियर इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट ऐंड रिसर्च ऐंड इंटरप्रेन्योरशिप, बेंगलुरु

-इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, भुवनेश्वर

-एमपी बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, बेंलगुरु

-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ प्लानिंग मैनेजमेंट, नई दिल्ली

-भारतीय विद्या भवन, कोलकाता

 

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