शरद व्याख्यानमाला में साहित्येत्तर विषयों पर हुए व्याख्यान, विभिन्न क्षेत्रों की आठ विभूतियां हुईं सम्मानित

भोपाल

भारत के पास अपना चिंतन और दर्शन है। कई सालों तक षडयंत्रपूर्वक भारत को अशिक्षित बताया जाता रहा। लेकिन सोचने वाली बात है कि यदि भारत अशिक्षित देश था तो यहां नालंदा जैसा विश्वविद्यालय और पुस्तकालय कैसे था। प्रकृति की रक्षा का भाव इस देश में कैसे पैदा हुआ? इन सब बातों को केंद्र में रखते हुए हमें हमारे गौरवशाली अतीत को दुनिया के सामने लाना चाहिए। उच्च शिक्षा मंत्री इंदरसिंह परमार बुधवार को हिंदी भवन में आयोजित शरद व्याख्यानमाला और सम्मान समारोह को संबोधित कर रहे थे।

म.प्र. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के इस वार्षिक आयोजन में सामयिक विषयों पर व्याख्यान के साथ ही आठ विभूतियों को राष्ट्रीय सम्मान भी प्रदान किये गये। कार्यक्रम की अध्यक्षता मानस भवन के कार्यकारी अध्यक्ष रघुनंदन शर्मा ने की। व्याख्यान माला के अंतर्गत प्रो. शरद सोनी ने ‘वैश्विक संकट: सभ्यतागत संघर्ष की आहट’ तथा प्रो. शंकरशरण ने ‘भारतीयता का संस्कार देने की दिशा’ विषय पर व्याख्यान दिये।

मंत्री परमार ने कहा कि हमें हमारी ज्ञान परंपरा की रक्षा के साथ सीमाओं की रक्षा भी करनी चाहिए। हमारी संस्कृति पर हमले करने वाले सीमा पार कर ही आये थे। मानस भवन के कार्यकारी अध्यक्ष शर्मा ने कहा कि आज 25 दिसंबर का दिन है,यह भारत के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी तथा मदनमोहन मालवीय का जन्म दिवस है। इस दिन के साथ मीठी स्मृतियों के साथ ही कुछ खट्टी यादें भी हैं।

समिति के मंत्री संचालक कैलाशचंद्र पंत ने कहा कि समाज में विमर्श का वातावरण बने इसके लिए समिति द्वारा विभिन्न व्याख्यान मालाएं आयोजित की जाती हैं। शरद व्याख्यान माला उन्हीं में से एक है। इसमें साहित्येतर विषयों पर वक्तव्य होते हैं। इसके पूर्व समिति के सहमंत्री डॉ. संजय सक्सेना ने अतिथियों का स्वागत् किया। सरस्वती वंदना राजकुमारी शर्मा ने प्रस्तुत की। संचालन साहित्यकार डॉ. अनिता सक्सेना ने किया तथा आभार प्रदर्शन रंजना अरगड़े ने किया।

इनका हुआ सम्मान

नरेश मेहता स्मृति वांग्मय सम्मान से सुप्रसिद्ध लेखक प्रमोद भार्गव, वीरेन्द्र तिवारी रचनात्मक सम्मान शिशिर कुमार चौधरी, बैतूल, शैलेश मटियानी कथा सम्मान शीला मिश्रा, भोपाल, सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘चन्द्र’ नाट्य सम्मान जयंत शंकर देशमुख, मुंबई,डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय स्मृति आलोचना सम्मान के. वनजा, कोच्ची, शंकरशरण लाल बत्ता पौराणिक सम्मान मोहन तिवारी आनंद, भोपाल, संतोष बत्ता स्मृति सम्मान इंदिरा दाँगी, भोपाल, संतोष श्रीवास्तव कथा सम्मान प्रभा पंत, हल्द्वानी को प्रदान किया गया। प्रभा पंत के अनुपस्थित रहने की दशा में उनकी बेटी ने सम्मान प्राप्त किया। सम्मानित रचनाकारों को नगद राशि शॉल, श्रीफल प्रशस्ति पत्र भेंट किया गया।

विदेशी भाषा ने संस्कृति का नुकसान किया

व्याख्यानों के चरण में प्रो. शंकर शरण ने ‘भारतीयता का संस्कार देने की दिशा’ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि आज भारत में भारतीयता के संस्कार की दिशा पर बात हो रही है। यह दु:खद स्थिति है। शायद मुगल और ब्रिटिश शासन में भी यह स्थिति नहीं रही। उन्होंने कहा कि हम हमारे संस्कारों से उदासीन क्यों हुए, इन विषयों की पड़ताल करनी होगी। इसकी वजह यह भी हो सकती है कि भौतिक प्रगति की चाह में हमारी शिक्षा और भाषा विदेशी विचारों से प्रभावित रही। अभारतीय भाषा ने हमारे आचार-विचार और संस्कृति को प्रभावित किया। प्रो. शंकर शरण ने कहा कि यदि हमें इससे उबरना है तो हमें दूसरों पर दोषारोपण, दलबंदी और राजनेताओं पर निर्भरता के साथ ही वेद-पुराणों की सीखों को जीवन में उतारना होगा। तभी हम हमारे संस्कारों की पुर्नस्थापना कर पाएंगे। ‘वैश्विक संकट: सभ्यतागत संघर्ष की आहट’ विषय पर शरद सोनी ने कहा कि विश्व में उतार-चढ़ाव आते ही रहते हैं। यह आर्थिक,सामाजिक तथा अन्य तरह के होते हैं। अपनी बात के समर्थन में उन्होंने पूर्व की वैश्विक स्थिति पर तथ्यात्मक और आंकड़ों के साथ अपनी बात रखी।

 

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