भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया गीता का ज्ञान आज भी अमृत रूप में प्रवाहित हो रहा है :हितानंद शर्मा

गीता जयंती (11 दिसंबर) पर विशेष
भोपाल

धर्म स्थापना के लिए मानव इतिहास में हुए सबसे भीषण महायुद्ध के बीच भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया गीता का ज्ञान आज भी अमृत रूप में प्रवाहित हो रहा है। श्रीमद्भगवत गीता केवल अर्जुन के लिए नहीं, सनातन समाज के लिए नहीं बल्कि विश्व मानवता के शुभ के लिए ईश्वरीय संदेश है। गीता के माध्यम से व्‍यक्‍त‍ि स्‍वयं को जान सकता है और ईश्वरीय सत्ता का अनुभव भी कर सकता है। गीता जयंती मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की मोक्षदा एकादशी तिथि को मनाई जाती है। यह वही दिन है जब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया था।

गीता के ईश्वरीय संदेश को जन-जन तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य ‘गीता प्रेस गोरखपुर’ द्वारा पिछले 102 वर्षो से बिना रुके पूरे श्रद्धाभाव से किया जा रहा है। भारत के घर-घर में श्रीमद्भगवत गीता और रामायण की प्रति पहुंचाने का श्रेय गीता प्रेस को ही जाता है। गीता प्रेस अब तक श्रीमद्भगवत गीता की 16 करोड़ 21 लाख प्रतियां प्रकाशित कर श्रद्धालु पाठकों तक पहुंचा चुका है।

अब तक  41 करोड़ 71 लाख पुस्तकें छापकर विश्व का सबसे बड़ा प्रकाशन संस्थान होने के बाद भी आश्चर्य की बात यह है कि गीता प्रेस न तो किसी से चंदा लेता है और न ही अपने प्रकाशनों में विज्ञापन ही स्वीकार करता है। जब वर्ष 2021 में गीता प्रेस को उसके उल्लेखनीय कार्यों के लिए भारत सरकार का गरिमामय ‘महात्मा गांधी शांति पुरस्कार’ प्रदान किया गया तो संस्थान ने पुरस्कार को पूरे सम्मान के साथ ग्रहण किया, पर इसके साथ प्रदान की जाने वाली एक करोड़ रुपए की पुरस्कार राशि सरकार को वापस लौटा दी थी। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस संस्थान के दर्शन के लिए आए थे। लागत मूल्य से 50 से लेकर 90 प्रतिशत तक कम कीमत पर बहुमूल्य  पुस्तकें पाठकों तक पहुंचाने वाला गीता प्रेस वास्तव में सामाजिक-धार्मिक जागरण का एक आंदोलन ही है।

भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण की पावन धरा उत्तरप्रदेश का प्रवास तो पूर्व में भी होता ही रहा है किन्तु इसी वर्ष संयोग से संगठन के कार्य से मुझे गोरक्ष प्रांत यानी गोरखपुर सहित आसपास के क्षेत्रों का प्रभार सौंपा गया। ऐसे में गोरखपुर में गोरक्ष पीठ सहित एक महत्वतपूर्ण तीर्थ गीता प्रेस के दर्शन का सौभाग्य भी मिला। प्रकाशन का केंद्रीय कार्यालय गोरखपुर में ही है। हिन्दू  धर्म, अध्यात्म, दर्शन सहित मानव कल्याण के अनेक विषयों पर पुस्तकें प्रकाशित कर चुका गीता प्रेस आधुनिक समय का तीर्थ ही है। राजा भागीरथ के महान तप से पुण्य प्रवाहिनी मां गंगा का धरती पर अवतरण संभव हो सका था। इक्ष्वाकु वंश के राजा भागीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए गंगा को धरती पर लाने का प्रण पूर्ण किया था। इसी प्रकार गीता प्रेस के संस्थापक, ब्रह्मलीन जयदयालजी गोयंदका के ऐसे ही महान तप का सुफल यह प्रकाशन है। वैसे तप तुलना का विषय नहीं है किन्तु  धर्म, संस्कृति, अध्यात्म, भक्ति एवं मानवता के उद्धार के लिए गोयंदका जी द्वारा स्थापित गीता प्रेस आज भी पुण्य प्रवाहमयी ज्ञान सरिता है।

गीता प्रेस के आदि संपादक हनुमान प्रसाद पोद्दार ‘भाईजी’ के उल्लेख के बिना गीता प्रेस की चर्चा पूर्ण नहीं होगी।  भाईजी वीर सावरकर के निकट के क्रांतिकारी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। अपने मौसेरे भाई जयदयालजी के अगाध गीता प्रेम एवं ज्ञान को देखते हुए भाईजी ने श्रीमद्भगवत गीता को लागत मूल्य से भी कम में जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया। इस संकल्प की पूर्ति के लिए अपने एक प्रकाशन की आवश्यकता थी जो गोरखपुर में प्रारंभ हुआ। प्रचार-प्रसार से दूर एक अकिंचन सेवक और निष्काम कर्मयोगी की तरह भाईजी ने सनातन संस्कृति की मान्यताओं को घर-घर तक पहुँचाने में जो अतुलनीय योगदान दिया है, इतिहास में इसका उदाहरण मिलना कठिन है।
 
गीता  प्रेस  का मुख्य उद्देश्य हिंदू धर्म के सिद्धांतों को गीता, रामायण, उपनिषद, पुराणों, प्रख्यात संतों के प्रवचन एवं चरित्र-निर्माण की अन्य पुस्तकें-पत्रिकाएं प्रकाशित कर इन्हें लागत मूल्य से भी कम कीमत में समाज में पहुंचाना है। गीता प्रेस मानव जीवन के उत्थायन और सभी की भलाई के लिए प्रयासरत है। इसका उद्देश्य शांति, आनंद और  मानव जाति के अंतिम उत्थान के लिए गीता में प्रतिपादित जीवन जीने की कला को बढ़ावा देना है।

संस्थान का संचालन कोलकाता के गोविंद भवन द्वारा किया जाता है। इसका प्रबंधन एक गवर्निंग काउंसिल (ट्रस्ट बोर्ड) करती है। गीता प्रेस में दिन की शुरुआत सुबह की प्रार्थना से होती है। एक व्यक्ति दिनभर घूम-घूम कर प्रत्येक कार्यकर्ता को कई बार भगवान का नाम स्‍मरण कराता है। गीता प्रेस के अभिलेखागार में भगवद् गीता की 100 से अधिक व्याख्याओं सहित 3,500 से अधिक पांडुलिपियां रखी हैं। गीता प्रेस के मासिक पत्रिका ग्रंथ ‘कल्याण’ के नए संस्करण के साथ 3000 से अधिक ऑनलाइन संग्रह उपलब्ध हैं। 4 मई 1923 को गीता प्रेस की स्थापना की गई थी तब पुस्तकें छापने का काम बोस्टन कंपनी की प्रिंटिंग प्रेस से शुरू किया गया था। पैरों से चलाई जाने वाली यह मशीन 500 रुपए में अमेरिका से मंगवाई गई थी। अब संस्थान आधुनिक संसाधनों का सदुपयोग करता है इसीलिए मैनुअल और मशीन दोनों माध्यमो से प्रकाशन का काम होता है। गीता प्रेस इन अर्थों में भी विश्व का अनूठा प्रकाशन है क्योंकि यह अपनी पुस्तकों में मात्रात्मक, व्याकरणिक, शाब्दिक अथवा तथ्यात्मक त्रुटि बताने वाले को पुरस्कृत करता है हालाँकि पुस्तकों में ऐसी त्रुटियां मिलती नहीं हैं।

बीते वर्षों में मीडिया में इस प्रकार के समाचार आए थे कि गीता प्रेस आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण बंद होने की कगार पर है किन्तु संस्थान के भ्रमण में यह भी जानने मिला कि स्थिति ऐसी नहीं है। समाज के सहयोग से गीता प्रेस 300 करोड़ रुपए वार्षिक टर्न ओवर वाला समृद्ध संस्थान है और प्रति वर्ष 17 भाषाओं में पुस्तकें प्रकाशित कर रहा है। संस्थान ने अपनी पुस्तकें इंटरनेट पर ऑनलाइन भी उपलब्ध कराई हैं जहां से कोई भी इन्हें  डाउनलोड कर सकता है और यह पूरी तरह निशुल्क है।

संस्थान का कार्यालय भी दर्शनीय है। इसके भव्य प्रवेश द्वार के स्तंभ एलोरा के प्राचीन गुफा-मंदिर के स्तंभों की शैली में निर्मित हैं। वहीं अर्जुन के रथ के सारथी बन श्रीकृष्ण गीता का उपदेश दे रहे हैं। प्रवेश द्वार का शिखर दक्षिण भारत के मीनाक्षी मंदिर के शिखरका स्मरण कराता है। इस प्रवेश द्वार का उद्घाटन 29 अप्रैल, 1955 को प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने किया था। संस्थान के परिसर में लीला चित्र मंदिर (आर्ट गैलरी) में 684 सुंदर चित्रों में भगवान राम और भगवान कृष्ण की लीलाओं को प्रदर्शित किया गया है। ये अलग-अलग समय के महान कलाकारों की कृतियां हैं। इनके अलावा अन्य पेंटिंग भी प्रदर्शित हैं। कृष्ण लीला को दर्शाने वाली पुरानी मेवाड़ी शैली की 92 पेंटिंग दर्शनीय है। दीवारों पर संगमरमर के ब्लॉकों पर पूरी गीता उकेरी गई है, साथ ही लगभग 700 दोहे और संतों के छंद भी हैं।

गीता प्रेस आधुनि‍क समय में हिन्दू धर्म, संस्कृति की पताका पूरे विश्व में फहरा रही है। जब भी बात हिन्दू धर्म के महान ग्रंथों की होती है तो सहज ही गीता प्रेस का नाम ध्यान में आ जाता है। आज की घोर व्यावसायिकता के युग में गीता प्रेस लोक कल्याण की भावना से प्रामाणिक पुस्तकें समाज को उपलब्ध करा रहा है। गीता प्रेस की यह पुण्य सलिला निरंतर प्रवाहमान रहने वाली है।

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