सैटेलाइट इमेज ने खोली चीन की बड़ी सैन्य योजना की पोल, भूमिगत हथियार ठिकानों से बढ़ी दुनिया की चिंता

नई दिल्ली

चीन के दूर-दराज के रेगिस्तानी इलाके में एक विशाल सैन्य परिसर तेजी से तैयार हो रहा है. सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह परिसर ऐसा बनाया जा रहा है कि अगर अमेरिका ने चीन के परमाणु हथियारों पर पहला हमला भी कर दिया, तो भी चीन के पास जवाबी हमला करने की पूरी क्षमता बनी रहे। 

सैटेलाइट इमेजरी से पता चलता है कि चीन अपने सबसे लंबी दूरी की मिसाइलों वाले साइलो क्षेत्रों के पास सैकड़ों लॉन्च पैड, बंकर और कम्युनिकेशन नेटवर्क बना रहा है. यह निर्माण चीन की परमाणु शक्ति को और मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। 

चीन पहले से ही ऐसी मिसाइलें बना चुका है जो अमेरिका के किसी भी शहर तक पहुंच सकती हैं. अब वह इन मिसाइलों को और सुरक्षित और प्रभावी बनाने के लिए बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर रहा है। 

क्या बन रहा है रेगिस्तान में?
पूर्वी शिनजियांग क्षेत्र में दो अष्टकोण (Octagon) आकार के विशाल सैन्य परिसर बनाए गए हैं. इनमें से एक उत्तरी अष्टकोण और दूसरा दक्षिणी अष्टकोण है. इनके चारों ओर सैकड़ों कंक्रीट पैड (Launch Pads) बनाए जा रहे हैं। 

विशेषज्ञों का अनुमान है कि ये पैड मोबाइल मिसाइल लॉन्चर, एयर डिफेंस सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर उपकरण और सैटेलाइट कम्युनिकेशन सिस्टम के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं. इन अष्टकोण संरचनाओं में सैनिकों के रहने की व्यवस्था, बड़े वाहनों के लिए शेड, हथियार भंडारण बंकर और कमांड सेंटर भी हैं। 

सैटेलाइट इमेजरी में साफ दिख रहा है कि इन परिसरों के आसपास सड़कें, रेलवे लाइन, एयरफील्ड और ईंधन स्टोरेज सुविधाएं भी बनाई जा रही हैं. हाल के महीनों में इन इलाकों में बड़े सैन्य वाहनों की गतिविधियां और अभ्यास भी देखे गए हैं। 

दूसरी स्ट्राइक क्षमता को मजबूत करना
चीन की परमाणु नीति नो फर्स्ट यूज (पहले हमला न करने) पर आधारित है. इसका मतलब है कि चीन कभी पहले परमाणु हमला नहीं करेगा, लेकिन अगर उस पर हमला हुआ तो जवाब जरूर देगा. इसी सेकंड स्ट्राइक की क्षमता को और मजबूत करने के लिए चीन यह पूरा नेटवर्क बना रहा है. अगर अमेरिका या कोई दूसरा देश चीन के साइलो को नष्ट करने की कोशिश भी करे, तो मोबाइल लॉन्चर और बंकरों की मदद से चीन जवाबी हमला कर सकेगा। 

अमेरिका के साथ बढ़ता परमाणु प्रतिस्पर्धा
अमेरिका और चीन के बीच तनाव बढ़ रहा है, खासकर ताइवान को लेकर. चीन का मानना है कि अमेरिका ताइवान मुद्दे पर हस्तक्षेप कर सकता है. ऐसे में चीन अपनी परमाणु क्षमता को तेजी से बढ़ा रहा है. पेंटागन की रिपोर्ट के अनुसार, चीन 2030 तक 1000 परमाणु वॉरहेड बना सकता है. चीन अब साइलो-बेस्ड मिसाइलों के साथ-साथ मोबाइल लॉन्चर और सबमरीन-बेस्ड मिसाइलों पर भी जोर दे रहा है। 

विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि चीन का यह निर्माण अभूतपूर्व है। 

    फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट के सदस्य हंस क्रिस्टेंसन ने कहा कि मैंने पहले कभी ऐसा कुछ नहीं देखा. यह एक असाधारण प्रयास है। 

    पैसिफिक फोरम के अलेक्जेंडर नील का मानना है कि हजारों वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला यह इंफ्रास्ट्रक्चर चीन की रणनीतिक परमाणु क्षमता को बहुत मजबूत करेगा। 

    कार्नेगी एंडाउमेंट के टोंग झाओ कहते हैं कि ये अष्टकोण संरचनाएं कमांड, कंट्रोल और कम्युनिकेशन (C3) सिस्टम से जुड़ी हो सकती हैं, जो परमाणु हमले के समय बेहद महत्वपूर्ण होती हैं। 

भारत के लिए क्या मायने रखता है?
चीन की बढ़ती परमाणु क्षमता भारत के लिए भी चिंता का विषय है. भारत और चीन की सीमा पर तनाव बना हुआ है. अगर चीन अपनी परमाणु क्षमता को इतनी तेजी से बढ़ा रहा है, तो भारत को भी अपनी रणनीतिक क्षमता पर ध्यान देने की जरूरत है. भारत पहले से ही अग्नि-5 जैसी लंबी दूरी की मिसाइलें विकसित कर चुका है, लेकिन चीन की गति काफी तेज है। 

चीन रेगिस्तान में जो विशाल परिसर बना रहा है. वह सिर्फ इमारतें नहीं, बल्कि एक मजबूत परमाणु प्रतिरोध की तैयारी है. अमेरिका के साथ बढ़ते तनाव के बीच चीन सेकंड स्ट्राइक क्षमता को इतना मजबूत कर रहा है कि कोई भी देश उसे आसानी से निशाना नहीं बना सके। 

 

 

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