MP में मानसून का असर कम, इंदौर-ग्वालियर में सूखा, भोपाल में ज्यादा बारिश की संभावना: IMD

भोपाल 

इस साल मानसून के कमजोर रहने की संभावना है। दो साल अच्छी बारिश होने के बाद इस साल सामान्य से कम बारिश होने के पूर्वानुमान ने चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि देश की लगभग आधी खेती मानसून पर निर्भर है। धान, दालों और तिलहन की बुवाई और पैदावार पर इसका सीधा असर पड़ सकता है। 

भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने  अपना पहला आधिकारिक अनुमान जारी किया। इसमें कहा गया है कि इस वर्ष देश भर में दक्षिण-पश्चिम मानसून (जून से सितंबर) के दौरान होने वाली वर्षा सामान्य से कम (लगभग सेंटीमीटर) रहने की संभावना है, जो भारत में मौसमी बारिश का दीर्घकालिक औसत (एलपीए-1971-2020) 87 सेंटीमीटर का लगभग 92 फीसदी है। एलपीए के 90 से 95% के बीच की बारिश को सामान्य से कम माना जाता है। निजी एजेंसी स्काईमेट ने भी करीब 94% बारिश का अनुमान लगाया है।

जून में मानसून सीजन शुरू हो जाएगा। 24 से 26 जून के बीच अंचल में मानसून की दस्तक हो जाती है। 2025 में मानसून समय से पहले आ गया था और अक्टूबर तक बारिश की थी। 2025 में हुई बारिश से अंचल के बाद व प्राकृतिक जल स्रोत भर गए थे। बारिश ने 90 साल का रिकॉर्ड भी तोड़कर नया बनाया था। 2026 के मानसून का पूर्वानुमान जारी किया है। इस पूर्वानुमान के अनुसार कम बारिश होगी। खंड बर्षा की वजह से बारिश असंतुलत रहेगी। कहीं सूखा रहेगा और कही बारिश होगी।

इस कारण प्रभावित हुआ है मानसून
-प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से में तापमान में बदलाव देखा जा रहा है। कमजोर ला–नीना जैसी स्थिति अब तटस्थ हो रही है और आगे चलकर एल नीनो जैसी स्थिति बनने की संभावना है। एल–नीनो के दौरान समुद्र का तापमान बढ़ जाता है, जिससे भारतीय उपमहाद्वीप की ओर आने वाली नमी कमजोर पड़ती है और मानसूनी बारिश घटती है।

आईएमडी के महानिदेशक डॉ. एम महापात्रा ने प्रेस वार्ता में कहा कि मात्रात्मक रूप से पूरे देश में मौसमी वर्षा एलपीए का 92 प्रतिशत' रहने की संभावना है, जिसमें 5 फीसदी की कमी- बेसी हो सकती है। पूर्वोत्तर, उत्तर-पश्चिम और दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत के कुछ क्षेत्रों में सामान्य से अधिक वर्षा होने की उम्मीद है। इनको छोड़कर देश के शेष हिस्सों में सामान्य से कम वर्षा की उम्मीद है। सामान्य से कम वर्षा का एक कारण जून में प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति का उभरना हो सकता है। आमतौर पर जब भी अल नीनो की स्थिति बनती है तो भारत में मानसून कमजोर पड़ जाता है और सूखे की स्थिति बनने का खतरा रहता है। हालांकि, हिंद महासागर में एक सकारात्मक द्विध्रुव (आईओडी) की स्थिति बन रही है। डॉ. महापात्रा ने कहा कि सकारात्मक आईओडी में सामान्य से अधिक वर्षा होती है। इसलिए उम्मीद है कि यह मानसून के दूसरे भाग में अल नीनो के प्रभाव को कम करने में सहायक होगा। आईओडी हिंद महासागर के पश्चिमी (अफ्रीका तट) और पूर्वी (इंडोनेशिया तट) हिस्सों के बीच समुद्र की सतह के तापमान का एक अनियमित अंतर (दोहराव) है।

भारत के लिए मानसूनी बारिश अहम
भारत की कुल वर्षा का लगभग 75 प्रतिशत मानसून के मौसम में होता है, जो सिंचाई, पेयजल और जलविद्युत उत्पादन के लिए आवश्यक है। लगभग 64 प्रतिशत भारतीय कृषि पर निर्भर हैं, जो मुख्य रूप से दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर है क्योंकि कुल बोए गए क्षेत्र का केवल लगभग 55 प्रतिशत ही सिंचाई के अंतर्गत आता है। देश के विभिन्न भागों में जलाशयों के भरने के लिए भी मानसूनी वर्षा महत्वपूर्ण है, जिनसे पेयजल की आपूर्ति होती है।

कम बारिश से घटेगा उत्पादन
पिछले दो साल से अच्छी बारिश होने से फसलों को काफी फायदा पहुंचा। नतीजा ये रहा है कि सोयाबीन का उत्पादन प्रति हेक्टेयर 2 क्विंटल तक बढ़ गया था। वहीं, गेहूं-चने के लिए भी अच्छा पानी मिला था। इससे उत्पादन बढ़ गया। इस साल यदि कम बारिश होती है तो पेयजल के साथ सिंचाई के लिए भी दिक्कतें खड़ी हो सकती है।

2017 में हुई भी सबसे कम बारिश, 2019 में जमकर बरसा पिछले 10 साल के बारिश के आंकड़े पर नजर डालें तो साल 2017 में सबसे कम बारिश हुई थी। प्रदेश की सामान्य बारिश औसत 37.3 इंच है। इसके मुकाबले औसत 29.9 इंच बारिश हुई थी। साल 2018 में 34.3 इंच बारिश दर्ज की गई थी।

सबसे ज्यादा पानी वर्ष 2019 में 53 इंच हुई थी। वहीं, 2021 और 2023 में सामान्य से थोड़ी ही कम बारिश हुई थी। 2024 में 44.1 इंच पानी गिरा तो 2025 में आंकड़ा 45.2 इंच तक पहुंच गया। इस तरह कह कहते हैं कि पिछले 7 साल से प्रदेश में अच्छी बरसात हो रही है। अब इस साल मानसून से भी यही उम्मीदें हैं।।

यह अपडेट साल 2025 का है। इसमें पूरे प्रदेश में अच्छी बारिश होने का अनुमान जताया था, जो सही निकला था, लेकिन साल 2026 में बारिश को लेकर स्थिति ठीक नहीं बताई जा रही है।

यह पड़ेगा प्रभाव
कम बारिश का धान, दालों और तिलहन की बुवाई और पैदावार पर सीधा असर पड़ सकता है। अगर फसल कम होती है, तो खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ सकते हैं, जिससे महंगाई बढ़ने का डर है। ग्रामीण इलाकों में आय कम होने से बाजार में मांग कम हो सकती है, जिसका असर देश की जीडीपी विकास पर भी पड़ सकता है।

गर्मी ने पकड़ा जोर….. उत्तर पश्चिम में उछला पारा, पूर्वोत्तर में बारिश जारी
देश के मौसम में इन दिनों स्पष्ट विभाजन देखने को मिल रहा है। एक और उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत में तापमान तेजी से बढ़ रहा है और कई राज्यों में लू की स्थिति बनने लगी है, वहीं दूसरी ओर पूर्वोत्तर भारत में बारिश, आंधी-तूफान और बिजली गिरने की घटनाएं जारी हैं। भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के ताजा अपडेट के अनुसार, उत्तर भारत में तापमान में अगले कुछ दिनों में 4 से 6 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ोतरी हो सकती है। इस बीच सौराष्ट्र, कच्छ, ओडिशा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में अलग-अलग दिनों में लू चलने का अनुमान है, जबकि गुजरात, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल में उमस भरी गर्मी लोगों को परेशान कर सकती है। मौसम विभाग ने किसानों को भी बढ़ती गर्मी के बीच फसलों की हल्की सिंचाई करने और तेज हवाओं से बचाव के उपाय अपनाने की सलाह दी है।

देश के मध्य और पूर्वी हिस्सों में मौसम की मौजूदा स्थिति के पीछे एक प्रमुख कारण ट्रफ प्रणाली है। यह ट्रफ, यानी कम दबाव की रेखा, मध्य प्रदेश से नागालैंड तक फैली हुई है और छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश और असम से होकर गुजर रही है। इसकी वजह से इन इलाकों में बादलों का निर्माण हो रहा है और वर्षा की संभावनाएं बढ़ी हैं। इसके साथ ही ऊपरी हवा में चक्रवाती परिसंचरण यानी हवा का घूमता हुआ क्षेत्र भी सक्रिय है, जो मौसम को अस्थिर बना रहा है और कई क्षेत्रों में आंधी-तूफान की स्थिति पैदा कर रहा है। आने वाले दिनों में देश के कई हिस्सों में तापमान में उल्लेखनीय वृद्धि होने की संभावना है।

उत्तर-पश्चिम भारत में 14 से 18 अप्रैल के बीच अधिकतम तापमान में 4 से 6 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ोतरी हो सकती है। मध्य प्रदेश में तापमान 3 से 5 डिग्री तक बढ़ सकता है। पूर्वी भारत में भी तापमान 3 से 5 डिग्री तक बढ़ सकता है। गुजरात और महाराष्ट्र में तापमान धीरे-धीरे बढ़ेगा, लेकिन उसके बाद इसमें अधिक बदलाव नहीं होगा। 

121% बारिश… अनुमान से 15% ज्यादा हुई थी, भोपाल समेत 30 जिलों में 'बहुत ज्यादा' गिरा पानी

पिछले साल प्रदेश में मानसून जमकर बरसा था। कुल 3 महीने 28 दिन मानसून बरसा और 10 साल में तीसरी बार सबसे ज्यादा पानी गिरा। वहीं, भोपाल, ग्वालियर समेत 30 जिले ऐसे रहे, जहां 'बहुत ज्यादा' बारिश दर्ज की गई। ओवरऑल सबसे ज्यादा बारिश वाला जिला गुना है। जहां पूरे सीजन 65.7 इंच पानी गिर गया, जबकि श्योपुर में औसत के मुकाबले 216.3% बारिश हुई। शाजापुर ऐसा जिला है, जहां सबसे कम 28.9 इंच (81.1%) ही बारिश हुई है। 50 जिलों में कोटे से ज्यादा बारिश दर्ज की गई।

मानसून को लेकर मौसम विभाग ने अपना आंकलन भी जारी किया था। जिसमें पूरे मानसूनी सीजन में प्रदेश में 106 प्रतिशत बारिश होने का अनुमान जताया था। इस अनुमान से 15 प्रतिशत पानी ज्यादा गिर गया। ग्वालियर-चंबल संभाग के जिलों में दोगुनी बारिश हो गई।

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