टेरर नेटवर्क का खुलासा: शाहीन के दस्ते ने कानपुर से खरीदी कारें, पांच शहरों में धमाके का ब्लूप्रिंट तैयार

कानपुर
फरीदाबाद विस्फोटक बरामदगी और दिल्ली ब्लास्ट में गिरफ्तार डॉक्टर शाहीन के दस्ते ने कानपुर से भी दो कारें खरीदी थीं। कानपुर, लखनऊ, वाराणसी, अयोध्या, प्रयागराज में धमाके की साजिश रची गई थी। कार का इस्तेमाल इन धमाकों में होना था या नहीं, अभी यह रहस्य नहीं खुला है। पुलिस और एजेंसियों को कानपुर से कारें खरीदने की भनक लग गई तो गाड़ियां गायब कर दी गईं। सुरक्षा एजेंसियों ने कानपुर के पुरानी कारों के बाजार से दो लोगों को उठाया गया है। उनसे पूछताछ की जा रही है।

खुफिया सूत्रों के मुताबिक डॉ. शाहीन और डॉ. आरिफ के साथ तीन अन्य डॉक्टर यूपी में बड़ी वारदात को अंजाम देने की साजिश रच चुके थे। इसके लिए ही अलग-अलग शहरों से पुरानी कारें खरीदने की योजना बनी। सूत्रों का कहना है कि कानपुर से दो कारें खरीदी गईं। इन्हें अलग-अलग स्थानों पर देखा गया। इनमें से एक कार से डॉ. आरिफ भी एयरपोर्ट के पास दिखाई दिया था। वह एयरपोर्ट के असपास क्यों गया, यह अभी साफ नहीं है।

अब तक की जांच में पता चला है कि दोनों कारें एक ही एजेंट से खरीदी गई हैं। छानबीन के सिलसिले में पुरानी कारों के एक व्यापारी और एक ड्राइवर को हिरासत में लेने के बाद दिल्ली में ले जाकर पूछताछ की जा रही है। केन्द्रीय खुफिया एजेंसी इससे जुड़े सुरागों की कड़ियां जोड़ रही है। अब तक पकड़े गए लोगों ने कार खरीदारों के पहचान पत्र समेत कई कागजात दिए हैं। साथ ही खरीदार बन कर आए तीन लोगों के हुलिए भी बताए हैं। इनमें से दो की शक्ल-सूरत, रंग, पहनावे और बोली से उनके कश्मीरी होने का संदेह है। एजेंसियों को कुछ ऐसी फुटेज भी मिली हैं जिनमें इन कारों पर सवार होकर आते-जाते लोग दिखे हैं। यह कारें प्रयागराज, लखनऊ नंबरों की हैं। कहा जा रहा है कि ऐसी ही एक फुटेज में डॉ. शाहीन भी डिफेंस एरिया में दिखाई दी है। एजेंसियां इन सभी बिंदुओं पर गहनता से जांच कर रही हैं।

टेरर की लाइफलाइन को वाहन कबाड़ों से मिल रही ऑक्सीजन
दिल्ली बम धमाके में इस्तेमाल हुई कार ने खरीद-फरोख्त के इस कारोबार में टेरर की लाइफलाइन पनपने का खुलासा किया है। कंडम वाहनों को खरीदने वाले कबाड़ों से आतंकवाद और अपराध को ऑक्सीजन दी जा रही है। कबाड़ मालिकों और निजी बीमा कंपनियों की मजबूत सांठगांठ और परिवहन व पुलिस विभाग के कमजोर निगरानी तंत्र से यह धंधा फल फूल रहा है।

कंडम वाहनों का पंजीकरण निरस्त कराए बिना ऐसे वाहनों की चेसिस नंबर और कागजात के जरिये देश के अलग-अलग हिस्सों में वाहन चल रहे हैं, जो पंजीकृत तो मूल स्वामियों के नाम से हैं लेकिन उनका इस्तेमाल अपराधी और आतंकवादी भी कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षा जांच एजेंसियां अगर भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) के सर्वेक्षकों और बीमा कंपनियों की मदद लें तो टेरर की लाइफलाइन को काटा जा सकता है।
टोटल लॉस क्लेम मिलने से खत्म नहीं होती जिम्मेदारी

कार वाहनों के बीमा के क्षेत्र में 80 प्रतिशत हिस्सेदारी निजी बीमा कंपनियों की है। इन कंपनियों में तैनात इनहाउस सर्वेयरों की भूमिका पर शतप्रतिशत भरोसा करना महंगा पड़ सकता है। किसी दुर्घटना में वाहन के अधिक क्षतिग्रस्त होने पर वाहन के बीमा की राशि लेने के लिए वाहन स्वामी जब बीमा कंपनी से संपर्क करता है तो कंपनी का सर्वेयर निरीक्षण करने पहुंचता है। जबकि आईआरडीएआई की गाइडलाइंस के मुताबिक वाहन में 50 हजार से अधिक के नुकसान पर आंकलन कंपनी का सर्वेयर नहीं बल्कि आईआरडीएआई के सर्वेयर करेगा।

कंपनियों के सर्वेयर बीमा ग्राहक पर वास्तविक नुकसान का आकलन न कर दबाव बनाकर उस पर ‘कैशलॉस’ कराने का झांसा देते हैं। इसके बाद पंजीकरण समेत उस वाहन को कबाड़ी को बेच देते हैं। दुर्घटना विषय विशेषज्ञ निर्मल त्रिपाठी के मुताबिक वाहन स्वामी गाड़ी का क्लेम लेकर आरटीओ के फॉर्म 29 और 30 पर ब्लैंक सिग्नेचर के बाद भूल जाते हैं। इसके बाद वाहनों की चेसिस और पंजीकरण का इस्तेमाल चोरी और दूसरी गाड़ियों में हो जाता है।

इंडियन मोटर टैरिफ के जीआर-8 के मुताबिक टोटल लॉस वाहनों पर कुल बीमित राशि लेना ग्राहक का अधिकार है। अगर बीमा कंपनियां उसे पूर्ण भुगतान करने से मना करती हैं या उसे कम ज्यादा राशि देने के लिए अनुचित दबाव बनाती हैं तो इसकी शिकायत आईआरडीएआई से कर सकते हैं। शिकायत पर बीमा कंपनियों पर करोड़ों का जुर्माना हो सकता है और लाइसेंस भी निरस्त हो कसता है।

75 प्रतिशत से अधिक क्षतिग्रस्त वाहन टोटल लॉस की श्रेणी में आते हैं। इसमें खाई में गिरकर पूरी तरह से बर्बाद गाड़ी, जली हुई और चोरी हुई गाड़ियां आती हैं। बीमा कंपनियां आईआरडीएआई के एक सर्कुलर में टोटल लॉस के साथ कंस्ट्रक्टिव टोटल लॉस का जिक्र न होने की खामी का फायदा उठा रही हैं।

कंडम वाहन के क्षतिग्रस्त होने के बाद बीमा की रकम लेने के बाद कबाड़ी को बेचे गए वाहन की चेसिस को निकलवार आरटीओ ऑफिस में जमा कराएं और आरसी निरस्त कराएं। दुर्घटना विषय विशेषज्ञ निर्मल त्रिपाठी के अनुसार सुरक्षा एजेंसियां आईआरडीएआई के सर्वेक्षकों और बीमा कंपनियों की मदद से आतंक और अपराध में यूज होने वाले ऐसे वाहनों का खेल बंद करा सकती हैं। बीमा कंपनियां भी नियमों का पालन करें।

 

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