अमेरिका नहीं चाहता था कि पाकिस्तान बिखर जाए, कर्ज पर टिकी इकॉनमी, भारत के सामने घुटने टेकने पड़े

नई दिल्ली

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने 10 मई की शाम को सोशल मीडिया पर एक पोस्ट किया और भारत-पाकिस्तान के बीच समझौता हो गया। इसके बाद पाकिस्तान की तरफ से आई तस्वीरों में जश्न का सा माहौल था, जबकि भारत में जैसे चुप्पी साध ली गई। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इसे अपनी जीत बताते हुए पाकिस्तानी सेना को बधाई तक दे डाली।

US-चीन एकमत: पाकिस्तान में मनाई जा रही खुशी समझौते की है या फिर इसलिए कि ट्रंप ने हार से बचा लिया? भारत के लोग इसे किस नजरिए से देखें? यह मसला दो देशों के बीच का था, तो ट्रंप ने इसकी घोषणा क्यों की? क्या इसका संदेश यह नहीं जाता कि ट्रंप हर हाल में पाकिस्तान को बचाना चाह रहे थे। वैसे चीन भी नहीं चाहता था कि भारत-पाकिस्तान टकराव जारी रहे क्योंकि कुछ मामलों में उसकी भी भद्द पिट रही थी, अमेरिका ने उसकी इच्छा पूरी कर दी। तो क्या पाकिस्तान मसले पर अमेरिका और चीन एकमत थे?

ट्रंप की बेचैनी: सिद्धांत रूप से चीन के लिए दक्षिण एशिया में पाकिस्तान का वही महत्व है, जो पश्चिम एशिया में अमेरिका के लिए इस्राइल का। अमेरिका भी पाकिस्तान को इसी नजरिए से देख रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि इसी वजह से ट्रंप इतने बेचैन थे? समझौते के बाद पूर्व सेना प्रमुख जनरल वेद प्रकाश मालिक ने जो ट्वीट किया, उसके कुछ तो मायने हैं, 'संघर्ष विराम 10 मई 2025 : हमने भारत के भविष्य को यह पूछने के लिए छोड़ दिया है कि पाकिस्तानी आतंकवादी हमले (22 अप्रैल को पहलगाम में) के बाद अपनी कार्रवाइयों से भारत ने कोई राजनीतिक या रणनीतिक लाभ हासिल किया या नहीं।' ऐसा ही कुछ पूर्व सेना प्रमुख मनोज नरवणे ने भी अपने ट्वीट की अंतिम पंक्ति में लिखा है, ' …हम हर बार घटनाओं पर आधारित प्रतिक्रिया देकर अपने लोगों की जान नहीं गंवा सकते। यह तीसरी बार है, अब आगे कोई और मौका नहीं।'

अनसुनी पुकार: ट्रंप के लिए यह खुशी का अवसर हो सकता है, वह दुनिया को यह संदेश देने में कामयाब हो गए कि अमेरिका अब भी दुनिया का लीडर है। उनके विदेश मंत्री ने इसका भरपूर प्रचार भी कर दिया। अमेरिका मानव हानि से बड़ा आहत दिखा। होना भी चाहिए। लेकिन क्या भारत से अधिक कोई राष्ट्र मानवीय संवेदनाओं से संपन्न है? स्पष्टतया नहीं। 1990 के दशक से ही भारत दुनिया को पाकिस्तान की आतंकी हरकतों का सबूत देता चला आ रहा है, पर किसी ने नहीं सुना। लेकिन, जैसे ही 9/11 की घटना हुई, अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ जंग छेड़ दी। अमेरिका ने जब काबुल में तबाही फैलाई, तो क्या आम अफगानी नहीं मरा?

पाकिस्तान पर मौन: काबुल के बाद अमेरिका ने बगदाद को निशाना बनाया, जिसका कोई औचित्य नहीं था। हां, उसे सद्दाम हुसैन की तरफ से कुछ खतरे दिख रहे होंगे, और उसने बगदाद का ध्वंस कर दिया। दुनिया उस समय मौन थी या तालियां बजा रही थी। दुनिया इस बात पर भी मौन रही कि दक्षिण एशिया में आतंकवाद का एपीसेंटर पाकिस्तान है, और उस पर कोई एक्शन नहीं हुआ।

आतंक की जड़: यह स्थापित हो चुका है कि पाकिस्तान ही एशिया में आतंकवाद की जड़ है। लेकिन, अमेरिका ने अफगान वॉर में उसे सिपहसालार बना लिया था। यह बात तो अमेरिकी सेना के जनरल डेविड पेट्रास ने भी कही थी कि अल-कायदा, पाकिस्तानी तालिबान, अफगान तालिबान, TNSM (तहरीक-ए-नफज-ए-शरीयत-ए-मोहम्मदी) के बीच सिम्बियोटिक रिलेशनशिप है, फिर भी अमेरिका खामोश रहा।

दबाव बढ़ रहा था: अंतरराष्ट्रीय मीडिया की खबरें बता रही थीं कि पाकिस्तान काफी दबाव में है। अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने लिखा था, 'भारत ने आतंकी संगठनों पर कार्रवाई कर पाकिस्तान को यह संदेश दिया है कि अब वह ऐसे हमलों को बर्दाश्त नहीं करेगा। पाकिस्तान अंदरूनी समस्याओं से जूझ रहा है। इमरान खान जेल में हैं, चुनाव विवादित रहे हैं। देश आर्थिक संकट में है…।'

पाकिस्तान में घबराहट: वहां तख्तापलट या मार्शल लॉ लागू होने की आशंकाएं जोर पकड़ रही थीं। टॉप लीडर और वरिष्ठ सैन्य अफसर अपना पैसा विदेश भेजने लगे थे। पाकिस्तान के स्टेट बैंक की जांच में यह बात पता चली। दूसरी तरफ, पाकिस्तान के ओपन एक्सचेंज मार्केट से डॉलर मिलना मुश्किल होने लगा था। उसके पास 12 दिन का आयात बिल चुकाने भर का विदेशी मुद्रा भंडार ही बचा था। अगर IMF से बेलआउट पैकेज की अगली किस्त न जारी होती, तो पाकिस्तान की आर्थिक गतिविधियां ही ठप पड़ जातीं। अब सवाल है कि जिस IMF में अमेरिकी इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, वहां भारत के विरोध के बाद भी पाकिस्तान को कर्ज मिल जाना क्या संकेत देता है?

बिखरने से बचाया: अमेरिका को अच्छी तरह मालूम था कि कर्ज पर टिकी इकॉनमी की वजह से पाकिस्तान को भारत के सामने घुटने टेकने पड़ेंगे। अमेरिका नहीं चाहता था कि ऐसा हो और पाकिस्तान बिखर जाए। ऐसे तो दक्षिण एशिया में भारत के लिए कोई चुनौती ही नहीं रह जाती। अमेरिका को यह स्वीकार नहीं था। उसे पाकिस्तान को बचाना था और इसका एक ही रास्ता था, समझौता।

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